हिंदी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन ने शेक्सपियर के मशहूर नाटक “मैकबेथ” का हिंदी अनुवाद किया था और उस नाटक का निर्देशन मेरे पिताजी ने किया था. 1958 जब दिल्ली में वह नाटक खेला गया तो उसमें तेजी बच्चन ने लेडी मैकबेथ की भूमिका निभाई थी और उस नाटक का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था. जब नाटक के लिए पात्रों का चुनाव हो रहा था तो तेजी बच्चन जी चाहती थीं कि उनके पुत्र अमिताभ बच्चन को भी कोई भूमिका मिले, लेकिन मेरे पिता ने उन्हें कोई रोल नहीं दिया. इस पर तेजी बच्चन ने हरिवंश राय बच्चन से इसकी शिकायत की. तब बच्चन जी ने कहा कि नाटक के निर्देशक वीरेंद्र नारायण हैं इसलिए उन्हें ही नाटक में किसी को रोल देने या ना देने का अधिकार है. इसके बाद पिताजी ने अमिताभ बच्चन को नाटक का पर्दा खींचना और गिराने की भूमिका दी थी. उस समय अमिताभ बच्चन महज 16 साल के थे. उस जमाने में आज की तरह रिमोट से रंगमंच पर पर्दा ऊपर उठाने और गिराने की परंपरा नहीं थी बल्कि, हाथ से ही यह काम होता था. इस तरह अमिताभ बच्चन का यह पहला रंगमंच से जुड़ाव था.
यह जानकारी वीरेंद्र नारायण के पुत्र विजय नारायण ने अपनी एक भेंट वार्ता में दी. बता दें कि 16 नवंबर को वीरेंद्र नारायण की सौंवीं जयंती मनाई जा रही है. इस अवसर पर नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वीरेंद्र नारायण के नाटक ‘बापू के साए में’ का भी लोकार्पण किया जाएगा. “बापू के साए में” नाटक का 1969 में गांधी जन्मशती पर भारत सरकार द्वारा मंचन करवाया गया था.
इस कार्यक्रम का आयोजन रज़ा फाउंडेशन, स्त्री लेखा और वीरेंद्र नारायण जन्मशती समारोह समिति मिलकर कर रही है. इस समारोह में राजधानी के दो युवा रंगकर्मियों को ‘वीरेन्द्र नारायण जन्मशती सम्मान’ से सम्मानित भी किया जा रहा है. सम्मानित होने वालों में एनएसडी रंगमंडल के प्रमुख राजेश सिंह और रंगमंच की चर्चित कलाकार प्रियंका शर्मा हैं.
बिहार के भागलपुर में 16 नवंबर, 1923 को जन्मे वीरेंद्र नारायण अपने समय के चर्चित नाटककार, निर्देशक, नाट्य आलोचक और रंगमंच के अभिनेता तो थे ही साथ में स्वन्त्रता सेनानी भी थे. 1942 के आंदोलन में तीन साल के लिए जेल भी गए थे. हिंदी के प्रख्यात लेखक फणीश्वर नाथ रेणु भी उनके साथ जेल के उसी वार्ड में थे. वीरेंद्र नारायण लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अखबार “जनता” में सहायक संपादक भी थे. वर्ष 1950 में वह रामवृक्ष बेनीपुरी के साथ “नई धारा” में भी सहायक संपादक थे.
वीरेंद्र नारायण के पुत्र विजय नारायण ने बताया कि उनके पिता ने जेल में ही नाटक लेखन शुरू किया और कैदियों ने उसका मंचन किया. वर्ष 1952 में नाटक “शरतचन्द्र” लिखा था. 1960 में नेत्रहीन पर नाटक “सूरदास” लिखा था. भारत में सॉन्ग एंड ड्रामा डिवीजन में काम करते हुए उन्होंने कई नाटक लिखे और देश में लाइट एंड साउंड प्रोग्राम के सूत्रधार थे. वीरेंद्र नारायण ने रामचरितमानस, विद्यापति, सुब्रमण्यम भारती और कृष्णदेव राय पर लाइट एंड साउंड के कार्यक्रम किए थे. इसके सैकड़ो शो उत्तर और दक्षिण भारत के शहरों में हुए. दिल्ली में जब “रामचरितमानस” का लाइट एंड साउंड कार्यक्रम हुआ था तो तत्कालीन प्रधनमंत्री मोरारजी देसाई और तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री लाल प्रसाद आडवाणी भी उसे देखने आए थे. दोनों ही नेताओं ने इस कार्यक्रम के लिए वीरेंद्र नारायण की बड़ी सराहना की थी.
विजय नारायण बताते हैं कि उस ज़ामने में हबीब तनवीर और इब्राहम अल्का जी की तरह उनके पिता भी विदेश से रंगमंच में प्रशिक्षण लेकर आये थे. पिता जी पहले भारतीय थे जिन्होंने लंदन के ड्रामाटिक आर्ट एंड म्यूज़िक इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लिया और लंदन में रंगमंच किया. पिता ने चार पांच उपन्यास लिखे. रंगकर्म पर पहली किताब लिखी. अंग्रेजी में भी नाटक लिखे. जयशंकर प्रसाद के नाटकों पर पुस्तक लिखी. उनके एक उपन्यास की भूमिका अज्ञेय जी ने लिखी थी. वे सितारवादक भी थे. अनिल विश्वास और विलायत खान जैसे लोगों से उनकी गहरी दोस्ती थी. उनके नाटकों से राज बब्बर, दिनेश ठाकुर, कविता चौधरी आदि जुड़े थे.
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FIRST PUBLISHED : November 15, 2023, 16:08 IST


