बांग्लादेश के इतिहास में शेख मुजीबुर्रहमान का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। ‘बंगबंधु’ के नाम से प्रसिद्ध मुजीब ने देश की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और बांग्लादेश को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का सपना साकार किया। लेकिन उनके जीवन का अंत बेहद दुखद और नृशंस था। 15 अगस्त 1975 की सुबह तख्तापलट के दौरान मुजीब और उनके परिवार के सदस्यों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस हमले में उनकी पत्नी फजीलतुन्नेसा, तीन बेटे- शेख कमाल, शेख जमाल और 10 वर्षीय शेख रसेल, और उनकी दो बहुएं सुल्ताना कमाल और रोजी जमाल भी मारे गए। मुजीब की दो बेटियां, हसीना और रेहाना, उस वक्त विदेश में थीं और इसलिए वे जीवित बचीं।
मुजीब की हत्या के बाद उनके परिवार के जीवित सदस्य, खासकर शेख हसीना ने उनकी विरासत को संभाला और बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हसीना ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ढाका के धानमंडी स्थित मकान नंबर 32 को एक संग्रहालय में बदल दिया। यह संग्रहालय बांग्लादेश की आजादी की कहानी और मुजीब की जीवन यात्रा को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण स्थल बन गया।
ढाका में मुजीब की मूर्ति तोड़ी गई, हसीना के घर और अवामी लीग दफ्तर पर भी हमला
हालांकि, हाल के घटनाक्रमों ने इस महत्वपूर्ण स्थल को भी हिंसा की चपेट में ला दिया है। बांग्लादेश में जारी राजनीतिक अशांति और सत्ता परिवर्तन के बीच, शेख हसीना की सरकार के गिरने के बाद उन्मादी भीड़ ने मुजीब की याद में बने इस संग्रहालय पर हमला कर दिया। सोमवार को प्रदर्शनकारियों ने धानमंडी स्थित मकान नंबर 32 पर धावा बोला, वहां तोड़फोड़ की और इसे आग के हवाले कर दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में इस हिंसक घटना के दृश्य सामने आए जिसमें लोग मुजीब के स्मारक भवन को जलाते हुए दिखाई दे रहे हैं।
यह घटना बांग्लादेश के लिए एक गहरा आघात है, क्योंकि यह न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर पर हमला है, बल्कि उन मूल्यों और संघर्षों पर भी हमला है जिनके लिए शेख मुजीबुर्रहमान ने अपनी जान दी। उनकी बेटी, शेख हसीना, जिन्होंने अपने पिता की विरासत को सहेजने का प्रयास किया, अब एक कठिन दौर से गुजर रही हैं। बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर शेख हसीना प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपना मुल्क छोड़ चली हैं। फिलहाल बांग्लादेश की सत्ता सेना के कब्जे में हैं।


