बांस अब सिर्फ झोपड़ी या टोकरी तक सीमित नहीं रह गया है. आज के समय में बांस का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कागज, रेयॉन और कपड़ा उद्योग, निर्माण कार्य, आर्किटेक्चर, इंजीनियरिंग, हैंडीक्राफ्ट, खाने-पीने और दवाइयों तक में हो रहा है. यही वजह है कि बांस की मांग देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी तेजी से बढ़ रही है. बांस पर्यावरण के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह हवा और पानी के प्रदूषण को कम करता है, जमीन को खराब होने से बचाता है, कार्बन को सोखता है और जलवायु बदलाव से लड़ने में मदद करता है.
इन सभी फायदों को देखते हुए बिहार सरकार ने प्रदेश में बांस की खेती को बढ़ावा देने का फैसला किया है. इसके तहत किसानों को बांस की खेती पर 50 फीसदी तक सब्सिडी दी जा रही है. सरकार का मानना है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी और ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए मौके बनेंगे.
क्यों फायदेमंद है बांस की खेती?
बांस की खेती को भविष्य की खेती माना जा रहा है. साल 2018 में बांस से बने उत्पादों का वैश्विक निर्यात मूल्य करीब 2.9 अरब डॉलर था. जानकारों के मुताबिक 2019 से 2025 के बीच इसमें हर साल करीब 5 फीसदी की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. भारत में भी बांस और बेंत उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है.
2019 में भारत के बांस और बेंत उद्योग का बाजार करीब 28 हजार करोड़ रुपये का था. 2018-19 में बांस का निर्यात 720 करोड़ रुपये के आसपास था, जो 2023-24 तक बढ़कर 1,163 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया. वहीं आयात में लगातार गिरावट आई है. यह आंकड़े बताते हैं कि आने वाले समय में बांस की खेती किसानों के लिए बड़ा फायदा दे सकती है.
राष्ट्रीय बांस मिशन से मिला सहारा
बिहार सरकार कृषि विभाग के अनुसार, राष्ट्रीय बांस मिशन योजना के तहत अब बांस की खेती करना और भी आसान हो गया है. इस योजना का मकसद किसानों को बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित करना और उनकी आमदनी बढ़ाना है. सरकार चाहती है कि किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बांस की खेती को भी अपनाएं.
यह योजना बिहार के 27 जिलों में लागू की जा रही है. इनमें अररिया, बांका, बेगूसराय, भागलपुर, दरभंगा, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, जमुई, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, लखीसराय, मधेपुरा, मधुबनी, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, सारण, शिवहर, शेखपुरा, सीतामढ़ी, सिवान, सुपौल, वैशाली और पश्चिम चंपारण शामिल हैं.
कौन ले सकता है योजना का लाभ?
इस योजना का लाभ पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर दिया जाएगा. एक ही परिवार में पति और पत्नी दोनों इस योजना का लाभ ले सकते हैं, लेकिन शर्त यह है कि दोनों के नाम अलग-अलग जमीन हो और जमीन के कागजात भी अलग हों.
जरूरी दस्तावेज
योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को कुछ जरूरी दस्तावेज ऑनलाइन अपलोड करने होंगे. इसमें भूमि स्वामित्व प्रमाण पत्र, पिछले दो साल से अपडेटेड राजस्व रसीद, ऑनलाइन अपडेटेड रसीद या वंशावली के आधार पर वैध भूमि स्वामित्व प्रमाण पत्र शामिल है.
योजना की मुख्य शर्तें
इस योजना के तहत निजी जमीन पर अधिक घनत्व में बांस का रोपण और खेत की मेड़ पर बांस लगाने के लिए सहायता दी जाएगी. निजी जमीन पर बांस लगाने के लिए न्यूनतम क्षेत्र 0.04 हेक्टेयर और अधिकतम 0.2 हेक्टेयर तय किया गया है. वहीं खेत की मेड़ पर प्रति किसान कम से कम 10 बांस के पौधे लगाने का प्रावधान है.
कितना मिलेगा अनुदान?
निजी जमीन पर अधिक घनत्व में बांस की खेती की लागत 1.2 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तय की गई है. इस पर सरकार 50 फीसदी यानी 60 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की सब्सिडी देगी. यह राशि दो साल में 60:40 के अनुपात में दी जाएगी. खेत की मेड़ पर बांस लगाने के लिए प्रति पौधा लागत 300 रुपये मानी गई है, जिसमें 50 फीसदी यानी 150 रुपये प्रति पौधा का अनुदान मिलेगा. यह राशि भी दो साल में दी जाएगी.
कहां से मिलेंगे बांस के पौधे?
उद्यान विभाग के अनुसार, बांस के पौधे सरकार द्वारा तय किए गए जलवायु अनुकूल किस्मों के होंगे. इन पौधों की आपूर्ति निविदा के माध्यम से चुने गए सप्लायर करेंगे, ताकि किसानों को सही और अच्छी गुणवत्ता के पौधे मिल सकें.
कैसे करें आवेदन?
इस योजना के लिए आवेदन पूरी तरह ऑनलाइन किया जाएगा. आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इच्छुक किसान बिहार उद्यान विभाग की आधिकारिक वेबसाइट https://horticulture.bihar.gov.in/ पर जाकर बांस की खेती के लिए अनुदान का आवेदन कर सकते हैं.


