हिंदी की प्रख्यात लेखिका नासिरा शर्मा का कहना है कि महात्मा गांधी सजावट और इस्तेमाल की वस्तु हो गए हैं. उनके उसूलों को भुनाया जा रहा है. साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नासिरा शर्मा ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘गांधी स्मृति वार्षिक व्यायख्यान’ पर ये बातें कहीं. समारोह में गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव अशोक कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया. प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने यूक्रेन, गजापट्टी सहित देश-दुनिया में बच्चों पर हो रही हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की.
नासिरा शर्मा ने ‘मेरे जीवन मे गांधी के रंग’ विषय पर अपने भाषण में दो टूक शब्दों में कहा कि जो देश की आजादी के लिए लड़े वे तो चले गए और जो अब हैं वह तो चुनाव जीत कर सत्ता में आए हैं, ये लोग अतीत की कुर्बानी देने वालों के नाम पर देश चला रहे हैं. आज जहां गांधीजी केवल सजावट बन गए हैं और उनके उसूलों को भुलाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि जब पूरे विश्व में हालात ऐसे हों तो हमें गांधी याद आते हैं और विश्व समाज को उनकी आज कितनी ज़रूरत है यह भी जग जाहिर है, जिसको भुनाना भी अवसरवादी भलीभांति जानते हैं.
नासिरा शर्मा ने गांधीजी की शहादत और विभाजन के दर्द को शिद्दत से याद करते हुए कहा कि उनकी कई रचनाओं में बंटवारे का दर्द व्यक्त हुआ है. यह सवाल मेरे जेहन में आज भी घूमता रहता है कि इस मुल्क का बंटवारा गांधी जी के रहते कैसे हुआ. मौलाना आज़ाद के रहते कैसे सम्भव हुआ जबकि मौलाना ने भी जामा मस्जिद की सीढ़ियों से अपील की थी कि आप लोग मुल्क छोड़कर न जाएं लेकिन अंग्रेजों की डिवाइड एंड रूल पॉलिसी जीत गई. 1857 में दोनों कौमों मिलकर लड़ी थीं, पर 1947 तक आते-आते मुल्क बंट गया.
भारत में राजनीति और धार्मिक जकड़न से ज्यादा सामाजिक पिछड़ापन है- नासिरा शर्मा
उन्होंने कहा कि “अक्सर मैं खुद से सवाल करती कि जब विश्वस्तर का नेता गांधी जिसकी डांडी मार्च किया, सत्याग्रह किया और जाने कितने दर्शन और विचारों को जिसने अपने अंदर समेटे हुए था, आखिर उन जैसे महान व्यक्तित्व वाले इंसान के रहते देश का बँटवारा क्यों हुआ? उन्होंने होने क्यों दिया? यह सवाल अपनी सारी मासूमियत भरी टीस के साथ शिकवे में बदल गया और लम्बे आरसे तक पीड़ा बना मेरे साथ रहा. शायद उसी की प्रतिध्वनियां मेरी कहानी ‘सरहद के इस पार’ में गहरे आक्रोश के रूप में रेहान के चरित्र में उभरी है. और एक रात रेहान अपने ही दोस्तों के द्वारा मार दिया जाता है, यह कह कर कि अपने धर्म भाइयों को छोड़कर एक हिन्दू लड़की को बचाने के लिए मार पीट पर उतर आया? रेहान की छोटी बहन परेशान है उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि भइया को यह क्या हो गया है वह ज़मीन पर पड़े हैं और सब उनके दोस्तों लापता हैं और उनकी जगह रामखिलावन पनवाड़ी खड़ा रो रहा है. उस कहानी की वह छोटी बच्ची मैं ही थी जो अपने समाज के प्रेम एवं घृणा के उलभाव को समझने या फिर सुलझाने की कोशिश में लगी हो या फिर 1857 और 1947 के फर्क़ को समझ रही हो जहां एकता ने अपने बाद का रास्ता बदल लिया हो?”

नासिरा शर्मा ने महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना आज़ाद को याद करते हुए कहा कि “आज भी लाखों लोग अबुल कलाम आजाद की आखरी तकरीर को नहीं भूले हैं जो उन्होंने जामा मस्जिद की सीढ़ी पर खड़े होकर दी थी- अपना देश छोड़ कर मत जाओ. खून, दुश्मनी, गलतफहमी में सियासत की राह उस तरफ मुड़ गई कि शयद बँटवारे के बाद यह खून-खराबा खत्म हो जायेगा. अग्रेजों की डिवाइड एंड रूल पॉलिसी की जीत हुई.
नासिरा शर्मा ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि गांधी आपको इस कदर प्रभावित करते हैं कि “एक बार जब मैं साबरमती आश्रम गयी तो वहां मना करने के बावजूद मैंने गांधीजी की छड़ी को छू लिया था और दूसरी जगहों पर जाकर कुछ देर चरखा चलाया था और अहसास जागा था कि चरखे का घुमाव आपके अंदर विचित्र-सा अहसास जगाता है. जैसे बहुत कुछ फिल्टर हो रहा हो. यह वही जगह थी जहां दक्षिण अफ्रीका से लौटकर गांधीजी ठहरे थे मगर वहां जब दलितों के दाखिले पर रोक लगा दी गई तो गांधीजी ने वह जगह छोड़ दी और वह प्यार मेरी कहानियों में दाखिल हो गया जहां उन्हें किरदार के रूप में दाखिले की कोई मनाही नहीं थी.”
ठीकरे की मंगनी, कुइयांजान, अजनबी जजीरा सहित तमाम चर्चित पुस्तकों की लेखिका नासिरा शर्मा ने कहा कि महात्मा गांधी स्वयं धार्मिक व्यक्ति थे लेकिन उन्हें दूसरे के धर्म का अध्ययन और आदर करना पसंद था. गैरबराबरी सहन नहीं थी. आज हम देख रहे हैं जुल्म व शोषण में कोई कमी नहीं है तब मानवीय स्तर पर हम गांधी की जबान बोलने लगते हैं. 1994 में आए मेरे उपन्यास ‘ज़िंदा मुहावरे’ के चरित्रों यानी लच्छू और ब्रिजू के रूप में सामने आए, उसी प्यार से रहे और यह भारत का सच है. बँटवारा हुआ, फसादों की झड़ी लग गई. यह खो रही सच्चाई थी जो गांधी वापस लाना चाह रहे थे.
नासिरा शर्मा ने कहा कि अंग्रेजों ने जो बीज 1947 में बोया उसका असर अब तक नजर आ रहा है. पूरे पचहत्तर वर्ष से फिलिस्तीनी कौम जंग में है. उस समय भी गांधीजी ने सत्याग्रह को मसले का हल माना था न कि हिंसा को. उन्होंने कहा कि मेरी नई पुस्तक ‘फिलिस्तीन: एक नया कर्बला’ कब्ज़ा और मातृभूमि के प्रेम की हकीकत को कहती है. कल तक जो यहूदियों को दर-बदर कर रहे थे वही आज उन्हीं के जरिए ग्रेटर इज़राइल का सपना देख फिलिस्तीनियों को खदेड़ कर दोबारा मध्यपूर्वी देशों में दाखिले का रास्ता बनाना चाहते हैं. जो मारकाट यूक्रेन-रूस में हो रही है वह भी गांधी की सोच के दायरे में नहीं है.
अंत में नासिरा शर्मा ने एक कविता ‘सिगरेट’ सुनाई –
जलाती हूं सिगरेट और
पहले कश में ही पहुंच जाती हूं
रूस-यूक्रेन के युद्ध स्थल पर
धुएं के छल्लों के बीच
खोलती हूं जादुई छतरी
और फिरती हूं बमों से बचती
लाशों के ढेर से गुज़रती
सपनों के अम्बार और मकानों के मलबे के
बीच से
पूछती हूं दोनों तरफ के सियासतदानों से
कूटनीति से जब नहीं चल रहा था काम
जरूरी था ख़ून बहाना, बात मनवाने के लिए?
किसको दे रहे थे जवाब या
बिकवा रहे थे हथियार?
किस को सबक सीखा रहे थे या मार रहे थे
कुल्हाड़ी अपने पैरों पर ?
इसी बीच
यूक्रेन बमों से फटी ज़मीन ने जब
उगला बरसों पहले का
वह नर-नारी कंकाल
उनके ढाँचों की मुद्रा ने
दिया दुनिया को संदेश
मरने के भी बचा रहता है प्यार
पुरातत्व विशेषज्ञों की जाँच और स्केच ने
पहनाया लिबास और दिया सुन्दर मुखड़ा
उन कंकालों को
देख कर
गुस्ताव किलमत की बनायी कालजयी
पेंटिंग ‘किस’ भी रह गयी दंग
सुलग रही मेरी उँगलियों में फंसी
सिगरेट
झड़ रही है राख
हो रहा छोटा सिगरेट का कद
बुझते सिगरेट के धुंए में
मुझे साफ नज़र आ रहा है
फिर दो नए देशों का जलता भविष्य !
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Tags: Hindi Literature, Literature, Mahatma gandhi, Mahatma Gandhi news
FIRST PUBLISHED : January 30, 2024, 17:35 IST


