Tuesday, March 3, 2026
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वो किसिंजर जिन्होंने इंदिरा गांधी को ‘बिच’ कहा था और भारतीयों को ‘बास्टर्ड’


हाइलाइट्स

इंदिरा गांधी को मिलने से पहले तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था
किसिंजर 70 के दशक के दौरान भारत और भारतीयों के प्रति अच्छा रवैया नहीं रखते थे

अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर का 100 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वर्ष 1971 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को फाड़कर बांग्लादेश बनवाया था, उस समय उनकी और किसिंजर की तकरार की खूब चर्चा हुई थी. तब इंदिरा गांधी अमेरिका दौरे पर पहुंची थी. अमेरिका के तत्कालीन प्रेसीडेंट रिचर्ड निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने ना केवल इंदिरा को दबाव में लेने की कोशिश की थी बल्कि मुलाकात से पहले उनके लिए अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल भी किया था. ये चर्चे आज भी चर्चित हैं. ये बात भी सर्वविदित हैं कि तरह तब इंदिरा गांधी के कदम ने किसिंजर को बौखलाकर रख दिया था.

70 के दशक में अमेरिकी डिप्लोमेट के तौर पर किसिंजर की तूती बोलती थी. उन्होंने पहले अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में काम किया और फिर विदेश मंत्री बने. किसिंजर को 70 के दशक में भारत के प्रति पूर्वाग्रह रखने वाला नेता माना जाता था. उन्होंने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल करते हुए बिच यानि कुतिया कहा था तो भारतीयों को बास्टर्ड यानि कमीने बोला था.

कुछ समय पहले अमेरिका ने वो केबल्स और जानकारियां सार्वजनिक की थीं, जिसमें भारत और इंदिरा गांधी के बारे में उनकी बातचीत के रिकॉर्ड्स हैं. इसमें वाशिंगटन में 5 नवंबर, 1971 को निक्सन और किसिंजर के बीच बातचीत हो रही है. दरअसल ये वो दिन है जब इंदिरा गांधी उनसे मिलने वाशिंगटन गई हुई थीं. मुलाकात होने ही वाली थी.

किसिंजर और निक्सन लगातार इंदिरा को कुतिया कहकर बुला रहे थे

इससे पहले किसिंजर और निक्सन के बीच बातचीत में इंदिरा गांधी और भारतीयों का जिक्र होता है. दोनों इंदिरा गांधी को कुतिया और भारतीयों को कमीने कहते हैं. उन्हें पूर्वी पाकिस्तान में भारत की संभावित कार्रवाई से इतराज है. किसिंजर इस बातचीत में लगातार इंदिरा गांधी के लिए कुतिया शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं. ये भी तय करते हैं कि इंदिरा जब मीटिंग के लिए आएंगी तो उनसे कड़ाई से पेश आया जाएगा.

वर्ष 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में दमन काफी बढ़ गया. असर भारत और यहां के लोगों पर पड़ने लगा, तब कार्रवाई अवश्यंभावी हो गई थी. पाकिस्तानी शासक जनरल याह्या खान अमेरिका की आंख के तारे थे. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उन्हें पसंद करते थे.

इंदिरा ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया
अगले दिन की मुलाकात में इंदिरा को कड़ी चेतावनी दी जाने वाली थी. मुलाकात की शुरुआत ही गड़बड़ रही. निक्सन ने हावभाव से जैसी शुरुआत की उसका वैसा ही जवाब इंदिरा से मिला. इंदिरा ने पूरी मुलाकात में कुछ ऐसा ठंडा रुख अख्तियार कर लिया, मानो उन्हें निक्सन की कोई परवाह ही नहीं हो.

निक्सन की चेतावनी की परवाह ही नहीं की
निक्सन ने चेतावनी दी, ”अगर भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई की हिम्मत की तो नतीजे अच्छे नहीं होंगे. भारत को पछताना होगा.” किसी और देश के लिए ये चेतावनी पसीने-पसीने कर देने वाली होती लेकिन इंदिरा किसी और मिट्टी की बनी थीं. उन्होंने निक्सन के साथ वैसा ही बर्ताव किया जैसा कोई समान पद वाला करता है.

इंदिरा न केवल गर्वीली थीं, बल्कि सम्मान से कोई समझौता नहीं करने वाली थीं. अमेरिका दौरे से पहले सितंबर में वह सोवियत संघ भी गई थीं. भारत को सैन्य आपूर्ति के साथ मास्को के राजनीतिक समर्थन की सख्त जरूरत थी.

सोवियत संघ में किया ये काम
जब वह पहुंची तो पहले दिन प्रधानमंत्री किशीगन से मुलाकात कराई गई. उन्होंने साफ जता दिया कि वह जो बात करने आईं हैं वह देश के असली राष्ट्रप्रमुख ब्रेझनेव से ही करेंगी. अगले दिन ब्रेझनेव से बातचीत हुई. वर्ष 1971 में इंदिरा ने अमेरिका और सोवियत संघ के लिए जैसे पांसे फेंके, वो बेहद नपी-तुली और समझदारी वाली विदेशनीति थी.

तीन दिन बाद भारतीय फौजों ने कार्रवाई शुरू कर दी
खैर अमेरिका से लौटते हुए इंदिरा गांधी पक्का कर चुकी थीं कि अब करना क्या है. तीन दिन बाद ही दिसंबर के पहले हफ्ते में भारतीय फौज ने पूर्वी पाकिस्तान में कार्रवाई शुरू कर दी. पाकिस्तानी सेना के पैर उखड़ने लगे.

ये खबर वाशिंगटन पहुंची तो निक्सन बौखला गए. उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि उनकी चेतावनी के बाद भी भारत ऐसा करेगा. कुंठित निक्सन ने चीन से संपर्क साधा कि क्या वह भारत के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है, चीन तैयार नहीं हुआ, क्योंकि उसे भी लगता था कि पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता ही एकमात्र हल है.

इंदिरा ने दिया दो-टूक जवाब
अब सीधे इंदिरा पर संघर्ष विराम का दबाव डाला गया. दो-टूक जवाब मिला-नहीं ऐसा नहीं हो सकता. अमेरिका ने अपने सातवें बेड़े को हिन्द महासागर में पहुंचने का आर्डर मिला. तो सोवियत संघ तुरंत सामने आकर खड़ा हो गया. भारत ने संघर्षविराम तो किया, लेकिन 17 दिसंबर को ढाका में भारतीय फौज के फ्लैग मार्च के बाद.

तब भारतीय फौजें पाकिस्तान में अंदर तक घुस सकती थीं
ये ऐसा समय था जब भारतीय फौज चाहतीं तो पश्चिम में पाकिस्तानी सीमा के अंदर तक जाकर उसके इलाके को हड़प सकती थीं, लेकिन इंदिरा ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने मास्को के जरिए वाशिंगटन को संदेश भिजवाया कि पाकिस्तानी सरजमीं को कब्जाने का उनका कोई इरादा नहीं है. उन्हें जो करना था, वो उन्होंने कर दिया.

माना जाता है कि भारत ने सबसे पहले बांग्लादेश को एक देश के रूप में मान्यता दी लेकिन ये सही नहीं है बल्कि ये काम छह दिसंबर को भूटान ने सबसे पहले कर दिया था. भारत ऐसा करने वाला दूसरा देश था. बांग्लादेश बनने के एक महीने के अंदर ही अंदर संयुक्त राष्ट्र के ज्यादातर देशों ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी. इस जीत और सैन्य अभियान ने यकायक इंदिरा और भारत की छवि पूरी दुनिया में बदलकर रख दी.

अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन इंदिरा गांधी के मिले घाव को जिंदगीभर नहीं भूल पाए. इंदिरा ने उन्हें ये याद दिला दिया था कि किसी देश और उसके राष्ट्रप्रमुख के साथ कैसे पेश आना चाहिए

निक्सन कभी इस घाव को भूल नहीं पाए
निक्सन कभी इस घाव को भूल नहीं पाए. याह्या खान के हाथ से पाकिस्तान की सत्ता चली गई. उन्हें जुल्फिकार अली भुट्टो को सत्ता सौंपनी पड़ी. भुट्टों ने सत्ता में आते ही उनसे सारे अधिकार और पद छीनकर नजरबंद कर दिया.

दुनियाभर में उनकी लोकप्रियता गजब की थी
इंदिरा इस कदर दुनियाभर के नेताओं में लोकप्रिय थीं कि वर्ष 1977 में चुनाव हारने के बाद जब उन्होंने लंदन का दौरा किया तो दुनियाभर के तमाम नेताओं ने उनसे वहां मुलाकात दी और वैसा ही सम्मान दिया, जो एक राष्ट्रप्रमुख को मिलता है.

Tags: Indira Gandhi, United States (US), United States of America



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