Friday, February 27, 2026
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संसद में पिछले साल बना कानून, हाई कोर्ट के 2 जजों की बेंच ने सुनाया अलग-अलग फैसला, आगे क्‍या?


नई दिल्‍ली. केंद्र सरकार ने संसद के दोनों सदनों में बीते साल सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2023 पास कराया. जिसका मकसद डिजिटल अपराध पर कड़ा कानून लेकर आना था. कानून तो बन गया लेकिन साथ ही इसके कुछ प्रावधारों के विरोध में कोर्ट में याचिकाएं भी लगने लगी. ऐसी ही कुछ याचिकाएं बॉम्‍बे हाई कोर्ट में स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स और न्यूज ब्रॉडकास्ट एंड डिजिटल एसोसिएशन ने लगाई. पेश मामले में हाई कोर्ट का फैसला आया तो हर कोई हैरान रह गया. दरअसल, इस मुद्दे पर दोनों जजों की राय अलग-अलग है. एक जज ने याचिकाओं के पक्ष में फैसला दिया जबकि दूसरे जज ने इसे खारिज कर दिया.

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2023 के विशेष रूप से नियम 3 में संशोधन की वैधता को लेकर याचिकाएं दायर की गई थी. यह नियम केंद्र सरकार को तथ्यों की जांच करने की शक्ति देता है. झूठी या फर्जी ऑनलाइन खबरों की पहचान करने के लिए केंद्र की फैक्‍ट चैक यूनिट इसे परखती है. न्यायमूर्ति जीएस पटेल और न्यायमूर्ति नीला गोखले की बेंच ने स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स और न्यूज ब्रॉडकास्ट एंड डिजिटल एसोसिएशन द्वारा दायर चार याचिकाओं पर आज फैसला सुनाया.

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संसद में पिछले साल बने कानून पर सुनवाई, एक जज ने पक्ष दूसरे ने विपक्ष में दिया फैसला, अब कैसे दिया जाएगा न्‍याय

10 दिनों तक सूचित नहीं किया जाएगा आदेश
जहां न्यायमूर्ति पटेल ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला दिया और प्रावधान को रद्द कर दिया, वहीं न्यायमूर्ति गोखले ने याचिकाएं खारिज कर दीं. लाइव लॉ वेबसाइट की खबर के मुताबिक इस मामले में बेंच के आदेश की विस्‍तृत कापी आना बाकी है. बॉम्‍बे हाई कोट के नियम के मुताबिक यह मामला अब तीसरे जज के पास जाएगा. इस बीच, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वासन दिया है कि फैक्‍ट चैक यूनिट को अगले 10 दिनों तक सूचित नहीं किया जाएगा. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा के किसी भी और विस्तार की मांग के लिए उचित मंच के समक्ष आवेदन देने की स्वतंत्रता दी है.

Tags: Bombay high court



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