Wednesday, February 11, 2026
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क्या होती है इद्दत, जिसके कारण इमरान खान की शादी मानी गई गैरकानूनी और हुई सजा, कब मुस्लिम विवाह माने जाते हैं अवैध


हाइलाइट्स

इद्दत वह अवधि है, जिसका पालन एक महिला को अपने शौहर के इंतकाल या तलाक के बाद करना होता है.
इसका मुख्य उद्देश्य तलाक या मृत्यु के बाद पैदा हुए बच्चे के पितृत्व के बारे में किसी भी संदेह को दूर करना है.
ज्यादातर एक तलाकशुदा महिला की इद्दत की अवधि लगभग 130 दिनों की होती है.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. अदालत ने 2018 में इमरान खान की बुशरा बीबी के साथ हुई शादी को अवैध करार दिया है. अदालत ने दोनों की शादी को कानून का उल्लंघन बताते हुए सात-सात साल की जेल और जुर्माने की सजा सुनाई है. इमरान खान पर आरोप था कि उन्होंने इस्लामी कानून के खिलाफ जाकर बुशरा बीबी के साथ निकाह किया. इमरान खान की शादी को लेकर विवाद तब और बढ़ गया, जब बुशरा के पूर्व पति खावर मेनका ने कहा कि इमरान ने बुशरा की इद्दत के दौरान उनसे निकाह किया था. आइए जानते हैं कि क्या होती है इद्दत और क्यों इसके दौरान कोई महिला निकाह नहीं कर सकती?

क्या है इद्दत?
इद्दत एक इस्लामी कानून है, जिसे दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक तरह से वेटिंग पीरियड है. इद्दत संयम की वह अवधि है, जिसका पालन एक महिला को अपने शौहर के इंतकाल या तलाक के बाद करना होता है. इद्दत के दौरान वह महिला किसी अन्य पुरुष से निकाह नहीं कर सकती है. इसका मुख्य उद्देश्य पूर्व पति के साथ तलाक या मृत्यु के बाद पैदा हुए बच्चे के पितृत्व के बारे में किसी भी संदेह को दूर करना है. इद्दत की अवधि अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग होती है. ज्यादातर एक तलाकशुदा महिला की इद्दत की अवधि लगभग 130 दिनों की होती है. इस दौरान उस महिला के निकाह करने पर पाबंदी होती है. अगर कोई महिला तलाक होने या विधवा होने के बाद गर्भवती है तो इद्दत तब तक जारी रहती है जब तक वह बच्चे को जन्म ना दे दे.

इद्दत के दौरान महिलाओं के लिए गैरपुरुषों से पर्दा करना भी जरूरी होता है. इस दौरान महिला के सजने-संवरने या मेकअप करने पर भी पाबंदी होती है. इसके अलावा भड़कीले कपड़े पहनने पर भी प्रतिबंध होता है. अगर महिला का कोई सहारा ना हो उसे घर से बाहर निकलने का अधिकार होता है.

इद्दत के दौरान किया गया निकाह अवैध
इद्दत के दौरान महिला किसी पुरुष से निकाह नहीं कर सकती. क्योंकि इद्दत के दौरान किया गया निकाह अवैध माना जाता है. यह प्रतिबंध इद्दत की अवधि बीत जाने के बाद ही खत्म होता है. लेकिन पुरुष चाहे तो इद्दत की अवधि के दौरान अपना मन बदल सकता है. वह अपना तलाक वापस ले सकता है. ऐसा होने पर महिला-पुरुष एक बार फिर से शादीशुदा हो जाएंगे.

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इद्दत के कई प्रकार होते हैं इनमें से कुछ इस तरह हैं-

विधवा की इद्दत
अगर कोई महिला विधवा हो जाती है तो उसे चार माह दस दिन की अवधि खत्म होने से पहले निकाह करना मना है. अगर वह गर्भवती है तो इद्दत का समय गर्भपात होने या बच्चे के पैदा होने तक खत्म नहीं होता.

तलाक के बाद इद्दत
अगर तलाकशुदा महिला को मासिक धर्म होता है तो इद्दत की अवधि तीन मासिक धर्मों तक होती है. यदि मासिक धर्म नहीं हो रहे हैं तो यह अवधि तीन चंद्रमास तक होती है.

अनियमित विवाह की स्थिति में
अनियमित विवाह की स्थिति में इद्दत का पालन करना आवश्यक नहीं होता है. लेकिन अगर पूर्ण विवाह है, या दूसरे शब्दों में कहें कि वो अगर जायज है तो इद्दत का पालन करना अनिवार्य होगा. 

इद्दत की अवधि
इद्दत की अवधि किसी भी विशेष स्थिति में बदल सकती है. इसका पालन धार्मिक तरीके से किया जाता है.

इद्दत में महिला के अधिकार
इद्दत की अवधि में महिलाओं के लिए कुछ अधिकार और कर्तव्यों को भी परिभाषित किया गया है

1 महिला इद्दत की अवधि में पति से भरण पोषण पा सकती है.
2 महिला मुवज्जल मेहर की हकदार हो जाती है.
3 इद्दत की अवधि में महिला किसी दूसरे पुरुष से विवाह नहीं कर सकती.
4 इद्दत की अवधि पूरी होने से पहले अगर दंपती में से किसी की भी मृत्यु हो जाती है, तो जीवित व्यक्ति संपत्ति में उत्तराधिकार पाने का हकदार होता है. 
5 अगर तलाक किसी बीमारी की हालत में दिया गया हो और पत्नी की इद्दत अवधि पूरी होने से पहले पति की मृत्यु हो जाती है तो पत्नी उसकी संपत्ति में उत्तराधिकार पाने की हकदार होगी.

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शादी को लेकर क्या कहता है मुस्लिम लॉ
मुस्लिम विवाह केवल दो मुस्लिमो के बीच होता है. अगर मुस्लिम पुरुष किसी दूसरे धर्म की महिला से शादी करता है तो वह वैध होगा, लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है. ऐसी स्थिति में मुस्लिम लॉ महिलाओं को ईसाई या यहूदी पुरुष से शादी करने से रोकता है. हां, अगर महिला किसी दूसरे धर्म के पुरुष से विवाह करे और बाद में वह पुरुष मुसलमान बन जाए तो निकाह वैध माना जाएगा.

मुस्लिम विवाह में दूसरे की पत्नी से विवाह या विवाहिता स्त्री द्वारा दूसरे पुरुष से विवाह जायज नहीं है. मुस्लिम लॉ में जब तक पहला विवाह कायम है तब तक विवाहिता स्त्री दोबारा विवाह नहीं कर सकती. कुछ अन्य परिस्थितियों में भी निकाह नहीं हो सकता है- जैसे गर्भवती स्त्री से विवाह, तलाक देने के बाद पुनः उन्हीं दोनों लोगों के बीच निकाह मान्य नहीं है. हज यात्रा के दौरान किया गया विवाह भी अमान्य है. हालांकि सुन्नी हनफी हज यात्रा पर किए गए विवाह को सही मानते हैं.



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