First Period Story: यूपी के मुजफ्फरनगर के गांव हसनपुर लोहारी गांव में हमारा छोटा सा घर था. वैसे तो मां-बाबा बहुत प्यार करते थे लेकिन बातचीत को लेकर बहुत खुलापन नहीं था. ऐसा सिर्फ मेरे ही घर में नहीं था बल्कि आज से 3 दशक पहले के समय में ज्यादातर घरों में यही हालात थे. उसी दौरान मुझे पहली बार पीरियड्स हुए. मैं टॉलयेट के लिए कई तो मुझे ब्लड जैसा दिखाई दिया. मैं काफी डर गई और सोचने लगी ये क्या हुआ लेकिन फिर खुद को समझाया कि हो सकता है, यहीं कुछ पड़ा होगा लेकिन 5 मिनट के बाद जब फिर ऐसा ही हुआ तो घबराकर मां के पास गई और सब बताया.
यह सुनकर मां ने धीरे से कहा कि किसी को कुछ बताना मत और सुन दूसरे वाले कमरे में जा, वहां कपड़ा रखा है, उसे लगा ले. मैं दूसरे कमरे में गई, वहां फटी-पुरानी चादर का टुकड़ा पड़ा था जो बहुत साफ भी नहीं था. यहां तक कि मुझे कपड़ा लगाने के बारे में भी कुछ नहीं पता था लेकिन फिर भी मैंने उसे फोल्ड करके लगा लिया.
चूंकि मां ने सिर्फ कपड़ा लगाना बताया था, उसे फेंकना या हटाना नहीं तो जैसे ही वह कपड़ा भीग गया, मैं बाथरूम में गई और उसे धोकर साफ किया और फिर गीला ही वापस लगा लिया. जब फिर से ब्लीडिंग के चलते वह खराब हुआ तो मैं फिर बाथरूम में गई और धोकर फिर लगा लिया. वह थोड़ा बहुत साफ होता था लेकिन धोने से और गीला हो जाता था. पहले और दूसरे दिन जब मैंने यही किया और मैं कमरे में पहुंची तो वहां से दुर्गंध आने लगी. या शायद मुझसे ही बुरी बदबू पूरे कमरे में फैल गई. मां ने पूछा ये स्मैल कहां से आ रही है.
मैं डर गई और फिर से बाथरूम में गई. तब मां को कुछ लगा और मुझसे पूछा कि मैं बार-बार बाथरूम क्यों जा रही हूं.. मुझे घबराहट हो रही थी लेकिन बदबू बढ़ रही थीं और गीला कपड़ा लगाए रखने से मुझे बहुत परेशानी भी हो रही थी तो मां को सब बता दिया. मां ये बात सुनकर सन्न रह गई.. और मुझसे तुरंत वह कपड़ा फेंकने के लिए कहा. फिर मां ने दूसरा कपड़ा दिया और बहुत कम शब्दों में बताया कि मुझे कपड़ा कैसे इस्तेमाल करना था. इन्फेक्शन का भी खतरा था लेकिन किसी डॉक्टर को नहीं दिखाया था. हालांकि इसके बाद भी कपड़े से पैड तक आने में लंबा वक्त लगा और पीरियड्स किसी बुरे सपने जैसे ही लगे.
बड़े होकर जब दिल्ली पहुंची तो मैं सच्ची सहेली के बारे में काफी सुनती आ रही थी कि ये पीरियड्स को लेकर जागरुक करते हैं. पहले मैं ये सोचती थी कि ये भी कोई बात है करने की? लेकिन जब डॉ. सुरभि से मिली तो पता चला कि यह बहुत जरूरी काम है. मैंने गांव में रहते हुए पीरियड्स में कितनी मुश्किलें झेली थीं. ये मुश्किलें अब मेरी बेटियों को न झेलनी पड़ें. सच्ची सहेली से जुड़कर हम कई अलग-अलग राज्यों में छोटी-छोटी बच्चियों और औरतों को ही नहीं बल्कि लड़कों और पुरुषों को भी, मेरे मां और बाबा इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन वे जहां भी हैं और मुझे देखते होंगे तो जरूर खुश होते होंगे.
(मैं जीनत अमान हूं, दिल्ली के पीतमपुरा में रहती हूं और पीरियड्स को लेकर जागरुक कर रहे संगठन सच्ची सहेली से न केवल जुड़ी हूं, बल्कि गांव-गांव जाकर लड़कियों और महिलाओं को पीरियड्स को लेकर जागरुक भी कर रही हूं. हालांकि पीरियड्स को लेकर मेरा पहला अनुभव काफी खराब रहा है. शायद यही वजह है कि मैं इससे जुड़ी परेशानी, शर्म, डर और झिझक को बेहतर तरीके से समझती हूं और अन्य सभी को भी अवेयर कर रही हूं. )
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FIRST PUBLISHED : February 7, 2024, 16:12 IST


