Tuesday, February 10, 2026
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जिन्ना कश्मीर में मनाना चाहते थे छुट्टी, महाराजा ने मना किया तो आग-बबूला हो गए; रची खौफनाक साजिश


भारत को आजाद हुए करीब ढाई महीने हुए थे. गुलाबी सर्दियां शुरू हो चुकी थीं. 24 अक्तूबर, 1947 की रात सैकड़ों पाकिस्तानी कबायली पठान दनदनाते हुए जम्मू-कश्मीर में घुसे आ रहे थे. उनका एक ही लक्ष्य था जम्मू-कश्मीर पर कब्जा. बंटवारे और भारत की आजादी के ठीक बाद पाकिस्तान ने जैसी साजिश रची, भारत ने उसकी कल्पना भी नहीं की थी. पाकिस्तान की इस खौफनाक साजिश की जड़ मोहम्मद अली जिन्ना की एक मामूली मांग में छिपी थी.

इतिहासकार डोमिनीक लापियर और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ”फ्रीडम एट मिडनाइट” में लिखते हैं कि जिन्ना बंटवारे की की बहस और सौदेबाजी करके बेहद थक गये थे. फेफड़ों में घातक रोग के कारण से उनका शरीर पहले से ही कमजोर था. इसलिए उन्होंने कुछ दिन छुट्टी मनाने का निर्णय लिया था. डॉक्टरों की भी सलाह थी कि वो कुछ दिन आराम करें.

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कश्मीर में छुट्टी मनाना चाहते थे जिन्ना
24 अगस्त 1947 को जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah) ने अपने अंग्रेज़ मिलिट्री-सेक्रेटरी कर्नल विलियम बिर्नी से कहा था कि वह कश्मीर जाकर सितंबर के मध्य में दो सप्ताह तक उनके वहां ठहरने और आराम करने का प्रबंध करा दें. लापियर और कॉलिन्स लिखते हैं कि ‘जिन्ना का छुट्टी मनाने के लिए कश्मीर को चुनना स्वाभाविक ही था. अपने अधिकतर देशवासियों की तरह जिन्ना भी इस बात की कल्पना तक नहीं कर सकते थे कि कश्मीर, जिसकी तीन-चौथाई से अधिक आबादी मुसलमान थी, पाकिस्तान का हिस्सा बनने के अलावा और भी कुछ बन सकता है…’

महाराजा ने साफ मना कर दिया
जिन्ना के सेक्रेटरी कर्नल विलियम बिर्नी 5 दिन बाद जो जवाब लेकर लौटे उसे सुनकर जिन्ना दंग रह गये. महाराजा हरी सिंह नहीं चाहते थे कि जिन्ना छुट्टी बिताने के लिए भी उनके क्षेत्र में कदम रखें. उन्होंने साफ मना कर दिया. महाराजा हरि सिंह (Maharaja Hari Singh) के इस जवाब से जिन्ना को पहली बार महसूस हुआ कि कश्मीर के हालात वाकई वैसे नहीं हैं, जैसा वह अपने मन में सोच बैठे थे. अड़तालीस घंटे बाद जिन्ना की सरकार ने चोरी से एक गुप्तचर को कश्मीर, ताकि महाराजा हरि सिंह के मंसूबों का पता लगाया जा सके.

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महाराजा हरि सिंह

गुप्तर का संदेश सुन टूट गए जिन्ना
गुप्तचर जो समाचार लेकर वापस आया उससे जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah) को बहुत धक्का पहुंचा. हरी सिंह का कोई इरादा अपनी रियासत को पाकिस्तान (Pakistan) में शामिल करने का नहीं था. पाकिस्तान की नींव रखने वाले लोग यह पचा नहीं पा रहे थे. सितंबर में लियाकत अली खां (Liaquat Ali Khan) ने लाहौर में कुछ चुनिंदा लोगों की एक गुप्त बैठक बुलाई. जिसमें तय किया जाना था कि आखिर महाराजा को कैसे मजबूर किया जाए? बैठक में पहले सीधे हमले का सुझाव आया, लेकिन पाकिस्तानी सेना कोई ऐसा जोखिम मोल लेने को तैयार नहीं थी, जिसके कारण हिंदुस्तान से उसकी सीधी जंग छिड़ जाए, लेकिन दो रास्ते और थे जिन पर विचार किया जा सकता था.

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मुहम्मद अली जिन्ना (दाएं) और लियाकत अली खान (बाएं)

भारत के खिलाफ रची साजिश
एक रास्ता कर्नल अकबर खां ने सुझाया जो सैंडहर्स्ट से फौजी शिक्षा प्राप्त करके आये थे और जिन्हें साजिश से बहुत लगाव था. उन्होंने सुझाव रखा कि पाकिस्तान, कश्मीर की असंतुष्ट मुस्लिम आबादी में विद्रोह भड़काने के लिए हथियार और पैसा दे, इस काम को पूरा करने में कई महीने तो लगेंगे लेकिन महाराजा मजबूर होकर पाकिस्तान में शामिल होने पर विवश हो जाएंगे. दूसरा सुझाव आया- पठान कबायलियों को भड़काकर, पैसा व हथियार देकर कश्मीर भेजा जाए. पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और जिन्ना के दाहिने हाथ लियाकत अली खान को यह सुझाव पसंद आया और फौरन हां कर दी.

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लापियर और कॉलिन्स लिखते हैं कि लियाकत अली खान ने कहा कि कश्मीर पर हमले के लिए सारा खर्च उनके गुप्तकोष से दिया जाएगा, लेकिन पाकिस्तान की सारी फौज, वहां के सरकारी अफसरों और अंग्रेज अफसरों को इसकी कानों-कान खबर न लगने पाए. उन्होंने दो टूक कहा कि पूरे मिशन को गुप्त रखना होगा. बहरहाल, पाकिस्तान अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाया. कबायली पठान जब जम्मू-कश्मीर में घुसे तो महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी. विलय की सारी शर्तें मानने को तैयार हो गए. हरि सिंह के हामी भरते ही भारत ने जवाज से अपनी फौज कश्मीर भेज दी.

Tags: Jammu kashmir, Jinnah, Mohammad Ali Jinnah



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