आरक्षण को लेकर हिंसक आंदोलन के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना इस्तीफा देकर पलायन कर गई हैं। वहीं अब बांग्लादेश के सेना प्रमुख वकार-उज-जमां ने देश की जिम्मेदारी लेने की बात कही है। उन्होंने लेगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। बांग्लादेश और पाकिस्तान की राजनीति की कहानी ज्यादा अलग नहीं है। दोनों ही देशों में सत्ता पर सेना हावी रही है। पाकिस्तान से स्वतंत्र होने के बाद से ही बांग्लादेश के इतिहास में सेना के सत्ता हथियाने की कई घटनाएं दर्ज हैं। यहां तक कि स्वतंत्र बांग्लादेश के पिता कहे जाने वाले शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या भी आर्मी में विद्रोह की वजह से ही हो गई थी। एक बार फिर बांग्लादेश सैन्य शासन की ओर जाता दिखाई दे रहा है।
टीवी पर एक वीडियो चलाया गया जो बांग्लादेश के भविष्य के लिए बड़ा संदेश है। प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमा पर भी हमला कर दिया और इसे तोड़ दिया। बता दें कि मुजीब की हत्या 1975 में सेना के विद्रोह के दौरान कर दी गई थी। शेख हसीना को छोड़कर उनका लगभग पूरा परिवार ही मौत के घाट उतार दिया गया था। वहीं शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी थी।
1971 का युद्ध
1970 के आम चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान में मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग ने 162 में से 160 सीटें जीतकर बड़ा बहुमत साहिल किया। वहीं पश्चिमी पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो की पीपीपी ने 138 में से 81 सीटें हासिल कीं। आवामी लीग की जीत के बाद भी पाकिस्तान के सेना प्रुख याह्या खान ने मार्शल लॉ के तहत सत्ता संभाल ली। उसने मुजीबुर्रहमान को कमान देने से इनकार कर दिया। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान में तनाव बढ़ गया और बंगाली संस्कृति, भाषा और राष्ट्रवाद के नाम पर आंदोलन शुरू हो गया।
7 मार्च 1971 ने पूर्वी पाकिस्तान में बांग्लादेश की आजादी का बिगुल बजा दिया। पाकिस्तान ने इसके बाद सैन्य अभियान शुरू किया और बड़ी संख्या में लोगों की हत्या करनी शुरू कर दी। बांग्लादेश में लोगों पर अत्याचार किया जाने लगा। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली सैनिकों ने विद्रोह किया और भारत के दखल के साथ बांग्लादेश स्वतंत्र हो गया। बांग्लादेश की आजादी के बाद मुक्ति वाहिनी के सदस्य सेना में भर्ती हो गए। हालांकि कुछ समय बाद ही सेना में असंतोष बढ़ने लगा। कहा जाने लगा कि पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह करने वाले सैनिकों और ना विद्रोह करने वालों के बीच भेदभाव किया जाता है।
चार साल बाद ही पहला तख्तापलट
15 अगस्त 1975 को बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार की हत्या कर दी गई। इसके बाद शेख हसीना ने भारत की शरण ले ली। उनके साथ उनकी बहन शेख रेहाना भी थीं। मेजर सैयद फारुक रहमान, मेजर खांडेकर अब्दुर राशिद और नेता खोंडाकर मुश्ताक अहमद ने नई सरकार बनाई। मुश्ताक अहमद को राष्ट्रपति बनाया गया और मेजर जनरल जियाउर रहमान नए सेना प्रमुख बन गए।
दूसरा तख्तापलट
कुछ महीने बाद ही ब्रिगेडियर खालिद मुशर्रफ ने फिर तख्तापलट कर दिया। वह मुजीब के समर्थक माने जाते थे। वह खुद सेना प्रमुख बन गए और जियाउर रहमान को नजरबंद कर दिया गया। माना जाता था कि बंगबंधु की हत्या करवाने में रहमान का ही हाथ था।
जल्द ही तीसरा तख्तापलट हुआ और वामपंथी सैनिकों ने राजनेताओं के साथ मिलकर विद्रोह कर दिया। इस सिपाही जनता क्रांति के तौर पर जाना जाता है। मुशर्रफ की हत्या कर दी गई और जियाउर रहमान राष्ट्रपति बन गए। इसके बाद 1978 में जियाउर रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बनाई और चुनाव जीत गए। हालांकि 1981 में सेना की एक टुकड़ी ने मोजर जनरल मंजूर के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। विद्रोहियों ने आरोप लगया कि राष्ट्रपति उनका समर्थन करते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के युद्ध में साथ नहीं दिया था। 24 मार्च 1982 को सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मोहम्मद इर्शाद ने संविधान को हटाकर सैन्य शासन लगा दिया और राष्ट्रपति अब्दुल सत्तार को हटा दिया। 1986 में इर्शाद ने जातीय पार्टी का गठन किया और आम चुनाव करवाया। इर्शाद राष्ट्रपति 1990 तक रहे।
1991 में एक बार फिर बांग्लादेश में संसदीय लोकतंत्र की वापसी हुई। 2006 में जब बीएनपी-जमात का कार्यकाल खत्म हुआ तो आवामी लीग ने फिर वापसी की। अक्टूबर में राष्ट्रपति इयाजुद्दीन अहमद ने खुद को अंतरिम सरकार का मुखिया घोषित किया. इसके बाद चुनाव का ऐलान किया गया। हालांकि जवनरी 2007 में आर्मी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल मोईन अहमद ने फिर सैन्य तख्तापलट कर दिया और सेना समर्थित अंतरिम सरकार बनाई। 2008 में जब जब चुनाव के बाद शेख हसीना की सरकार बनी तब जाकर सैन्य शासन खत्म हुआ। अब एक बार फिर बांग्लादेश सैन्य शासन की ओर बढ़ गया है।


