Women Farmers In India: भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ हमारी महिला किसान हैं जो खेतों में बदलाव की नई कहानी लिख रही हैं. आंकड़ों की बात करें तो देश के एग्रो-सेक्टर में लगभग 80 परसेंट काम करने वाली आबादी महिलाओं की है जिनमें से करीब 33 परसेंट महिलाएं बतौर लेबर और 48 परसेंट सेल्फ-एम्प्लॉयड किसान के रूप में एक्टिव हैं.
हालांकि जमीन के मालिकाना हक के मामले में संख्या थोड़ी कम है लेकिन मेहनत के मामले में इनका कोई मुकाबला नहीं है. आज के दौर में महिलाएं सिर्फ पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं हैं बल्कि वे एग्री-टेक और मॉडर्न फार्मिंग को अपनाकर खेती को एक मुनाफे वाला बिजनेस बना रही हैं. जान लें किस खेती में हैं सबसे ज्यादा योगदान.
बुवाई से लेकर कटाई तक में योगदान
भारत में अनाज और सब्जी उत्पादन का शायद ही कोई ऐसा कोना हो जहां महिलाओं का पसीना न बहा हो. धान की रोपाई हो या गेहूं की कटाई, महिलाओं का फिजिकल और मैनेजमेंट रोल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. रिसर्च बताती है कि ग्रामीण भारत में कृषि से जुड़ी लगभग 70 से 80 प्रतिशत एक्टिविटीज में महिलाएं फ्रंटलाइन पर रहती हैं.
वे बीजों के सिलेक्शन से लेकर फसल की सुरक्षा और स्टोरेज तक की पूरी कमान संभालती हैं. खास तौर पर हॉर्टिकल्चर यानी बागवानी और सब्जियों की खेती में महिलाओं की मेहनत की वजह से प्रोडक्शन की क्वालिटी काफी बेहतर रहती है. जो मार्केट में अच्छी कीमत दिलाने में मदद करती है.
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पशुपालन और डेयरी सेक्टर
खेती के साथ-साथ पशुपालन और डेयरी सेक्टर को चलाने में महिलाओं का सबसे बड़ा और कीमती योगदान है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और इस कामयाबी के पीछे उन करोड़ों महिलाओं की मेहनत है जो घर संभालने के साथ-साथ पशुओं की देखभाल भी करती हैं.
चारे का इंतजाम करने से लेकर दूध निकालने और उसे को-ऑपरेटिव सोसाइटीज तक पहुँचाने का काम 70 परसेंट से ज्यादा महिलाएं ही मैनेज कर रही हैं. डेयरी फार्मिंग ने महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया है जिससे वे अपने परिवार और बच्चों की शिक्षा पर बेहतर खर्च कर पा रही हैं.
एग्री-बिजनेस में बढ़ती हिस्सेदारी
अब समय बदल रहा है और महिलाएं सिर्फ खेतों में मजदूरी नहीं कर रहीं बल्कि एग्री-एंटरप्रेन्योर यानी उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बना रही हैं. सेल्फ हेल्प ग्रुप्स और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के जरिए महिलाएं अब अपनी फसलों की प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और डायरेक्ट मार्केटिंग खुद कर रही हैं. ऑर्गेनिक फार्मिंग और वर्मी कंपोस्टिंग जैसे नए क्षेत्रों में महिलाओं की रुचि ने खेती को सस्टेनेबल बनाने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है.
सरकार भी अब महिला किसान सशक्तिकरण जैसी योजनाओं के जरिए उन्हें मॉडर्न टूल्स और ट्रेनिंग दे रही है जिससे वे ग्लोबल मार्केट की डिमांड को समझ सकें. आने वाले समय में खेती में महिलाओं की भागीदारी में और इजाफा हो सकता है.
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