Papaya Variety Muskmelon: गर्मियों का मौसम आते ही बाजार में रसीले और मीठे खरबूजे की मांग तेजी से बढ़ने लगती है. यही वजह है कि अब कई किसान पुरानी तरह की फसलों की जगह कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली खेती की तरफ रुख कर रहे हैं. ऐसे ही कुछ मामले अब भी देखने को मिल रहे हैं. दरअसल कई किसान अब पपीता वैरायटी के खरबूजे की खेती कर रहे हैं और इस सीजन में लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं.
क्यों बनी हुई है पपीता वैरायटी के खरबूजा की डिमांड?
दरअसल कुछ किसान बताते हैं कि उन्होंने करीब 5 बीघा जमीन में पपीता वैरायटी का खरबूजा लगाया है. वहीं बाजार में इस किस्म की काफी डिमांड रहती है क्योंकि इसका स्वाद मीठा होता है और फल अच्छी क्वालिटी का निकलता है. उनका कहना है कि एक बीघा खेत से करीब 50 से 60 क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है. फिलहाल मंडियों में खरबूजा लगभग 10 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा हो रहा है. ऐसे में पूरे सीजन में यह खेती लाखों रुपये की कमाई का जरिया भी बन सकती है.
कैसे की जाती है पपीता वैरायटी के खरबूजे की खेती?
खरबूजे की खेती के लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है. इसके बाद खेत में गोबर की सड़ी खाद या वर्मी कंपोस्ट मिलाया जाता है, ताकि मिट्टी उपजाउ बनी रहे. पपीता वैरायटी के बीज कतारों में लगाए जाते हैं. एक कतार से दूसरे कतार के बीच करीब 5 से 6 फीट की दूरी रखी जाती है, जबकि पौधों के बीच दो से तीन फीट का गैप जरूरी माना जाता है. बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना भी जरूरी होता है, ताकि फसल रोगों से सुरक्षित रह सके. बीज बोने के बाद हल्की सिंचाई की जाती है, पौधे निकलने के बाद समय-समय पर खरपतवार हटाना, जैविक खाद देना और फसल की निगरानी करना जरूरी होता है. सही देखभाल के साथ करीब 75 से 90 दिनों में फसल तैयार हो जाती है.
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सिंचाई में बरतनी होती है खास सावधानी
एक्सपर्ट्स के अनुसार काली मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है. इसलिए बार-बार पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती.बुवाई के बाद तुरंत बाद पहली सिंचाई जरूरी होती है, ताकि बीज अच्छी तरह अंकुरित हो सके. गर्मी के मौसम में सामान्यतः 7 से 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई पर्याप्त मानी जाती है. हालांकि तापमान ज्यादा होने पर 5 से 6 दिनों में भी पानी देना पड़ सकता है. फल बनने के समय मिट्टी में नमी बनाए रखना जरूरी होता है, क्योंकि पानी की कमी से फल छोटे रह सकते हैं और मिठास भी कम हो सकती है. वहीं ज्यादा पानी देने से जड़ों में सड़न और फल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए खेत में जलभराव बिल्कुल नहीं होने चाहिए. कई किसान अब ड्रिप सिंचाई का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे नियंत्रित मात्रा में पानी मिलता है और उत्पादन बेहतर होता है.


