Dimethoate Harmful Effect On Crops: खेती-किसानी के बदलते दौर में हम फसलों को बचाने के लिए इस कदर अंधाधुंध केमिकल छिड़क रहे हैं कि मुनाफे की होड़ में खुद अपनी थाली में धीमा जहर परोस रहे हैं. इसी खतरनाक खेल का एक बड़ा चेहरा है डाइमेथोएट जो दुनिया भर के 31 देशों में पूरी तरह से बैन हो चुका है. लेकिन भारत के बाजारों में यह आज भी धड़ल्ले से बिक रहा है.
यह कीटनाशक फसलों को कीड़ों से तो बचाता है लेकिन इसके छिड़काव से मिट्टी, पानी और इंसानी सेहत को जो नुकसान पहुंच रहा है, उसकी भरपाई करना नामुमकिन है. जहां दुनिया के कई देश इसके खतरों को जानकर इसे अपने यहां बैन कर चुके हैं. वहीं हमारे देश में यह आज भी खुले में बेचा जा रहा है. आखिर क्यों हो रहा ऐसा जानें क्या है इसके पीछे वजह?
फसलों के लिए काफी खतरनाक धीमा जहर
डाइमेथोएट एक ऐसा केमिकल है जो छिड़काव के बाद सीधे पौधे के अंदरूनी सिस्टम में समा जाता है. जब कोई कीड़ा इस पौधे को खाता है तो वह मर जाता है. लेकिन इसके साथ ही यह जहर फसल के फल, फूल और अनाज का हिस्सा भी बन जाता है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि धोने या पकाने के बाद भी इस केमिकल के अंश पूरी तरह से खत्म नहीं होते और सीधे हमारी थाली तक पहुंच जाते हैं.
इसके लगातार इस्तेमाल से खेतों के मित्र कीड़े, जैसे मधुमक्खियां और केंचुए भी खत्म हो रहे हैं. जो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं. लंबे समय में यह फसलों की क्वालिटी को तो बिगाड़ता ही है. तो इसके साथ ही हमारी सेहत के लिए कैंसर और नर्वस सिस्टम से जुड़ी गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण बन रहा है.
डाइमेथोएट की मार झेल रही हैं यह फसलें
यह खतरनाक कीटनाशक किसी एक फसल तक सीमित नहीं है. इससे मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिंडी और गोभी जैसी हरी सब्जियों पर कीड़ों को मारने के लिए इसका सबसे ज्यादा अंधाधुंध छिड़काव किया जा रहा है.
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इसके अलावा आम, नींबू, संतरा और सेब जैसे बागवानी फलों में भी यह जहर छिलके से होते हुए सीधे गूदे तक समा जाता है. कपास जैसी नकदी फसलों के साथ-साथ सरसों, सोयाबीन और दालों की खेती में भी इसका खूब इस्तेमाल हो रहा है. जिससे खेतों के मित्र कीट मर रहे हैं.
बैन के बावजूद भारत में क्यों बिक रहा है?
अब सवाल यह उठता है कि जब दुनिया के इतने सारे देशों ने इसके खतरनाक असर को देखते हुए इसे बैन कर दिया है. तो भारत में यह अभी तक बैन क्यों नहीं हुआ? इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह बेहद सस्ता है और बाजारों में आसानी से मिल जाता है. जिसकी वजह से छोटे किसान बिना इसके नुकसान को जाने इसे खरीद लेते हैं. हमारे यहां आज भी कीटनाशकों के कड़े नियमों को जमीन पर लागू करने में लंबा वक्त लग जाता है.
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