Thursday, July 16, 2026
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Indian Cattle Breeds: खेत जोतने के लिए किस नस्ल के बैलों का किया जाता था इस्तेमाल? आज उनकी कितनी है कीमत


Indian Cattle Breeds: एक समय था जब भारत में खेती की पहचान बैलों से होती थी. ट्रैक्टर और दूसरी आधुनिक कृषि मशीनों के आने से पहले खेत की जुताई, बुवाई और फसल ढोने जैसे लगभग सभी काम बैलों की मदद से किए जाते थे. अलग-अलग राज्यों में वहां की जलवायु और खेती के तरीके के अनुसार अलग-अलग नस्ल के बैल पाले जाते थे. इनमें कुछ नस्लें अपनी ताकत, सहनशक्ति और काम करने की क्षमता के कारण किसानों की पहली पसंद मानी जाती थी.

आज भले ही खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ गया हो, लेकिन कई इलाकों में देसी नस्ल के बैलों का महत्व अब भी बना हुआ है. अच्छी नस्ल के बैलों की खरीद-बिक्री आज भी पशु मेलों और बाजारों में होती है. आइए जानते हैं खेत जोतने के लिए किन नस्लों के बैलों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता था और आज उनकी कीमत कितनी है.

नागौरी नस्ल ने ताकत और फुर्ती से बनाई अलग पहचान

राजस्थान की नागौरी नस्ल को देश की प्रमुख कार्यशील नस्लों में गिना जाता है. इस नस्ल के बैल तेज चाल, मजबूत शरीर और लंबे समय तक लगातार काम करने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं. बाजार में अच्छी नस्ल के नागौरी बैलों की एक जोड़ी की कीमत आमतौर पर 50 हजार रुपये से लेकर 4 लाख रुपये तक हो सकती है. कीमत उनकी उम्र, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण और नस्ल की शुद्धता पर निर्भर करती है.

हरियाणा नस्ल लंबे समय तक रही किसानों की भरोसेमंद साथी

हरियाणा नस्ल के बैल उत्तर भारत में खेती के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली नस्लों में शामिल रहे हैं. इनका शरीर मजबूत, कंधे चौड़े और काम करने की क्षमता अच्छी मानी जाती है. हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई किसान वर्षों से इस नस्ल के बैलों का उपयोग खेत की जुताई के लिए करते रहे हैं. यही वजह है कि पशुपालकों के बीच आज भी इस नस्ल की अच्छी मांग बनी रहती है.

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कांकरेज बैलों की सहनशक्ति ने दिलाई खास पहचान

गुजरात और राजस्थान में पाई जाने वाली कांकरेज नस्ल अपनी ताकत और सहनशक्ति के लिए जानी जाती है. इस नस्ल के बैलों का इस्तेमाल खेत जोतने के साथ-साथ बैलगाड़ी खींचने और अन्य कृषि कार्यों में भी किया जाता रहा है. यही कारण है कि यह नस्ल आज भी भारत की प्रमुख देसी कार्यशील नस्लों में गिनी जाती है.

ओंगोल बैलों की ताकत ने बढ़ाया पारंपरिक खेती का भरोसा

आंध्र प्रदेश की ओंगोल नस्ल अपने बड़े आकार, मांसल शरीर और दमदार ताकत के लिए जानी जाती है. इन बैलों का उपयोग वर्षों से खेत की जुताई में किया जाता रहा है. कई कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बैलों से की गई जुताई कुछ परिस्थितियों में मिट्टी पर भारी मशीनों की तुलना में कम दबाव डालती है, यही वजह है कि प्राकृतिक और पारंपरिक खेती करने वाले कुछ किसान आज भी इस नस्ल को महत्व देते हैं.

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