स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदाना हैं, जिन्होंने अपने दोस्त और कंपनी के सीओओ नागा भरत डाका के साथ मिलकर इसकी शुरुआत की थी। आइए जानते हैं, कौन हैं पवन कुमार चंदना और कैसे उन्होंने इस ऐतिहासिक उपलब्धि तक का सफर तय किया।
भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए 18 जुलाई 2026 का दिन ऐतिहासिक बन गया। देश की पहली निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने अपने स्वदेशी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट ‘विक्रम-1’ का सफल प्रक्षेपण कर नया इतिहास रच दिया। ‘मिशन आगमन’ के तहत रॉकेट ने 18 जुलाई को दोपहर 12:08 बजे आंध्र प्रदेश स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के प्रथम लॉन्च पैड से सफल उड़ान भरी। इस उपलब्धि के साथ स्काईरूट भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए एक नया मील का पत्थर स्थापित करने में सफल रही। स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदाना हैं, जिन्होंने अपने दोस्त और कंपनी के सीओओ नागा भरत डाका के साथ मिलकर इसकी शुरुआत की थी। आइए जानते हैं, कौन हैं पवन कुमार चंदना और कैसे उन्होंने इस ऐतिहासिक उपलब्धि तक का सफर तय किया।
शुरुआती पढ़ाई थी कमजोर
पवन कुमार चंदाना का जन्म वर्ष 1991 में तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्हें मशीनों और तकनीक को समझने का शौक था, लेकिन शुरुआती दिनों में उनकी पढ़ाई बहुत शानदार नहीं थी। स्कूल के समय एक परीक्षा में उन्हें गणित में सिर्फ 51 अंक मिले थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही छात्र आगे चलकर भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में इतिहास रचने वाला बनेगा।
पिता ने दिलाई IIT-JEE की कोचिंग
पवन के पिता चाहते थे कि उनका बेटा ऊंचाइयों तक पहुंचे। इसी सोच के साथ उन्होंने उन्हें IIT-JEE की कोचिंग दिलाई। यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। गणित और विज्ञान की पढ़ाई के दौरान इन विषयों में उनकी गहरी रुचि विकसित हुई और धीरे-धीरे उनका प्रदर्शन भी बेहतर होता गया।
साल 2007 में पवन ने पहले ही प्रयास में IIT-JEE परीक्षा पास कर IIT खड़गपुर में दाखिला हासिल किया। यहां से उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डुअल बीटेक-एमटेक (BTech-MTech) डिग्री पूरी की। जहां उनके कई सहपाठी आकर्षक पैकेज वाली नौकरियों और विदेश में करियर बनाने की राह पर निकल पड़े, वहीं पवन का सपना रॉकेट और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में कुछ नया करने का था।
ISRO से एंटरप्रेन्योरशिप तक
2012 में चंदाना कैंपस से ही साइंटिस्ट के तौर पर इसरो (ISRO) में शामिल हुए। कम सैलरी के बावजूद, उन्होंने वहीं से रिटायर होने का सपना देखा क्योंकि उन्हें तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में अपना काम बहुत पसंद था। उन्होंने वहां लगभग छह साल तक काम किया और GSLV Mk-III (भारत का सबसे भारी लॉन्च व्हीकल), GSLV Mk-II के लिए S-200 सॉलिड बूस्टर में योगदान दिया। ISRO के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) के लिए डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम किया। 2016 में उन्हें इसरो में इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड मिला।
बनाई अपनी स्पेस टेक कंपनी
उनके मन में भारत में एक स्पेस-टेक कंपनी बनाने का विचार आया। लेकिन उनके मन में यह आइडिया तब आया था जब देश में प्राइवेट रॉकेट डेवलपमेंट की न तो इजाजत थी और न ही उसके लिए फंडिंग मिलती थी। लिहाजा पवन और उनके दोस्त नागा भरत ढाका ने सरकारी नौकरी छोड़कर जून 2018 में हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की नींव रखी। उनका मिशन है कि अंतरिक्ष तक पहुंच को इतना आसान बनाया जाए, जितना कोई कैब बुक करना होता है।
हालांकि कई करीबियों ने उनके इस फैसले की आलोचना की थी और इसे जोखिम भरा बताया था। बिजनेस या प्रोफेशनल नेटवर्क में कोई बैकग्राउंड न होने के बावजूद उन्होंने अपना सफर शुरू किया और LinkedIn पर Myntra, CureFit और NuRX के फाउंडर मुकेश बंसल को कोल्ड मैसेज करके फंडिंग की कोशिश की। हैरानी की बात यह थी कि आईआईटी खड़गपुर के ही पूर्व छात्र बंसल ने उनके विजन पर भरोसा किया और उनके वेंचर में 1.5 मिलियन डॉलर का निवेश किया। हालांकि जल्द ही कोविड 19 महामारी आ गई जिससे सीरीज ए फंडिंग जुटाना मुश्किल हो गया। जब उनका सपना नामुमकिन लगने लगा, तो रिन्यूएबल एनर्जी की बड़ी कंपनी ग्रीनको (Greenko) के फाउंडर्स ने आर्थिक मदद के लिए हाथ बढ़ाया।
2020 में रॉकेट इंजन का टेस्ट
जुलाई 2020 में, उनकी कंपनी रॉकेट इंजन का टेस्ट करने वाली पहली प्राइवेट भारतीय कंपनी बनी। इस इंजन का नाम ‘रमन-1’ था, जो एक क्रायोजेनिक इंजन था और नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन के नाम पर रखा गया था। साल 2021 भारतीय स्पेस उद्योग के लिए बड़ा बदलाव लेकर आया। केंद्र सरकार ने पहली बार निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे खोले। इस मौके का सबसे बड़ा फायदा स्काईरूट एयरोस्पेस को मिला। चंदाना की स्काईरूट एयरोस्पेस ISRO के साथ समझौता ज्ञापन साइन करने वाली पहली प्राइवेट कंपनी बनी और बाद में भारत की सबसे बड़ी डीप-टेक फंडिंग ($51 मिलियन) हासिल की।


