‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ का शिशुवत् छात्र होने के कारण राम पर तो पूरा अधिकार है ही. माया की उपाधि से युक्त ब्रह्म यानी मेरे राम के बारे में लिखने से पूर्व ही पूर्ण विश्वास है कि संत महापुरुष तथा विद्वत्जन अपनी सहज उदारता से क्षमा ही नहीं करेंगे वरन् आशीर्वाद भी देंगे. अबोध होने के कारण ज्ञान के उपासक क्षमा करेंगे. एकादश रूद्रों के उपासक सामाजिक मनुष्य जो दश प्राणेन्द्रियों के मालिक हैं और एक मन से युक्त वो भी मुझ धृष्ट पर सहज ही उदार होंगे. बचे वैष्णव तो वो भी प्रच्छन्न वेदांती मानस के रचयिता तुलसीदास के मंगलाचारण को देख मुझ पर दयादृष्टि करेंगे.
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः.
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्..
जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रम्हादि देवता और असुर हैं. जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भांति यह सारा दृश्य जगत सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र नौका है. उन समस्त कारणों से पर (सब कारणों के कारण और सर्वश्रेष्ठ) राम कहलाने वाले भगवान हरि की मैं वंदना करता हूं.
संकेत मात्र यहां कहने की आवश्यकता है कि वेदांत दर्शन का सर्वोत्तम उदाहरण ‘रस्सी और सर्प’ यहां भी प्रयुक्त है. अब आगे ब्रह्म की अभिन्न माया को भी प्रच्छन्न वेदांती तुलसी के शब्दों में देख लेते हैं.
उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम् .
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम् ..
उत्पत्ति, स्थिति और लय करने वाली क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचंद्रजी की प्रियतमा श्री सीताजी को मैं नमस्कार करता हूं.
कबीर कहते हैं – निर्गुण राम, जपहुं रे भाई, बुद्ध तो अपने को वेदगू और वेदंतगू कह प्रच्छन्न वेदांती होने के आनंद में डूब गए और समाज प्रखर वेदांती आचार्य शंकर को आजतक प्रच्छन्न बुद्ध सिद्ध करने में तुला हुआ है. निर्गुण निराकार ब्रह्म का ही सगुण साकार मायोपाधिक रूप राम है. प्रणव मंत्र ऊं त्रिगुणात्मक (सत् रज तम्) त्रिगुणातीत शब्द राम से ही उत्पन्न है. राम तो हट, घट, और पट यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है. हट को देखें तो दुनिया के नवोदित धर्म जो धर्म के दर्शन से अनभिज्ञ है. अभी अपने शैशवावस्था में राम को ना समझ के पर्याप्त दूरी पर हैं. उनके केन्द्र में भी राम ही हैं. लेकिन वो वृत्त की परिधि पर इलेक्ट्रॉन की भांति नाच रहे हैं. घट को देखें तो कहने की जरूरत ही नहीं मेरा राम घट-घट में है. पट की बात करें तो चलचित्र की भांति जो पट पर दिखाई देकर भी नहीं होता. उसी भांति सकल दृश्यमान जगत भ्रम ही है. राम अपनी अभिन्न माया के साथ अद्वैत ही है. केवल माया के कारण हम सब में उपाधि युक्त द्वैत से भागते हैं. अब समय आ गया है कि राम के नाम पर हो रहे जातियों के झमेले पर भी कुछ प्रकाश डाल दिया जाए.
सृष्टि से पूर्व एक अद्वितीय ब्रह्म ही था. ज्ञाता भी वही, ज्ञेय भी वही. उस समय तो निश्चित ही यही बोध रहा होगा ‘अहम् ब्रह्मस्मि’ अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूं. किसी को जानना वहीं हो जाना है. ब्रम्हविद ब्रह्म हो जाता है. दुनिया की सारी खुराफात की जड़ तो द्वैत यानी दो अर्थात् मेरे और तेरे के बोध से शुरू होती है. सारे भय की जड़ अर्थात् प्रिय के खोने और अप्रिय रूपी शोक की जड़ द्वैत है.
एक और अद्वितीय (ब्रह्म) रमण किसके साथ करता. उसने अपने इस एकाकीपन से बाहर निकलने के लिए इच्छा की. इस इच्छा मात्र का संकेत ही तो माया को चाहिए था. वो अभिन्न माया भिन्न माया परम पुरुष की काया के वाम भाग से स्त्री रूप में उत्पन्न हुई. माया ने आवरण और विक्षेप का खेल शुरू कर दिया और वो परम पुरुष अपने अर्द्धांश से ही समागम को विकल हो बैठा. इस माया रूपी शतरूपा ने जितने भी रूप धरे, उस मोहित परम पुरूष ने उतने ही विपरीत जोड़ी के रूप में नानात्व सृष्टि की रचना कर डाली. जो लोग समझते हैं कि जन्म से कोई श्रेष्ठ और हीन होता है तो वो निरा मूर्ख है.
ब्रह्म को जो अपने से भिन्न नहीं मानता, वह ब्राह्मण है. ब्रह्म ही क्षत्रिय की योनि है. इसी से क्षत्रिय की उत्पत्ति हुई. अब भी विभूति के लिए तो वैभव अपेक्षित था. वह वाणिज्य से ही संभव है. अतः वैश्य जाति के वसु, रूद्र, आदित्य, विश्वदेव और मरूत आदि देवता और उन लोगों की सृष्टि की. शांति और व्यवस्था के बिना तो समाज की रचना हो ही नहीं सकती थी. यही कारण था कि क्षत्रिय पूर्व वैश्य की सृष्टि संभव नहीं थी. विभूति युक्त कर्म करने की क्षमता तो इसके बाद भी न आ सकी. व्यापार-वाणिज्य हेतु अतिरिक्त उत्पादन चाहिए ही. अब स्थानीय शिल्प और उद्यम हेतु कुशल और अकुशल श्रमिकों की सेना हेतु चतुर्थ वर्ण के देवता पूषा और उनके लोगों की सृष्टि हुई. पूषा अर्थात् पोषण करने वाले सूर्य के ही रूप हैं. यह पृथ्वी स्वयं भी पूषा है. ये हैं हमारे चारों वर्ण. एक ही मायोपाधिक राम इन सभी में विराजमान है. वही ब्रह्म अग्निरूप से देवताओं में ब्राह्मण, मनुष्यों में ब्राह्मण रूप में भी ब्राह्मण, क्षत्रिय रूप में क्षत्रिय, वैश्य रूप में वैश्य और चतुर्थ वर्ण रूप में चतुर्थ वर्ण.
पते की बात यह है कि मनुष्य को आंतरिक राम अर्थात् आत्मलोक की ही उपासना कर अपने स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए. वह भले ही संसार में किसी कर्म में क्यों न रत हो ? है तो वह राम (ब्रह्म) का ही प्रतिरूप. यह राम अर्थात् आत्मा ही समस्त जीवों का लोक है. इसके ही विविध धर्म-कर्म विविध लोकों को और विविध प्राणियों और जीव-जंतुओं को पहुंचाते हैं. उसी में ही उन सभी का निवास है. यह कुछ वैसी ही स्थिति है, जैसे जिस घर को हम अपना निवास स्थान समझते हैं. उसी ही जीव, जंतु, कीट पतंग, चींटी आदि का भी निवास होता है और वे भी उसे ही अपना निवास स्थान समझते हैं. अतः हमें यह ध्यान रखना है कि हमारे किसी भी राम का अनिष्ट न हो और सबसे मैत्रीभाव हो.
भारतीय संस्कृति कुछ और नहीं हमारे प्राणवायु राम का ही चिंतन मनन है. हमसे भिन्न मत और विचार वाले भी हमारे ही राम हैं. तभी तो हम भोले भाले लोग न जानते हुए भी अपने संबोधन में किसी को राम-राम से ही शुरुआत करते हैं. इसका गूढ़ तो इसी में छिपा है कि सभी राम ही हैं.
मनुष्यता से प्रेम ही अपने राम से प्रेम है. दूसरों से प्रेम करना अपने राम यानि अपने से प्रेम है और दूसरों से घृणा अपने आप से घृणा है. ब्रह्मांड बाहर नहीं भीतर भरा है. आपके भीतर के राम का प्रसार ही यह सकल ब्रह्मांड है और सकल ब्रह्मांड के राम आप ही हैं. राम को समझ लेना ही राम हो जाना है. यही जीवन का मूल मंत्र बन जाए तो राम राज्य लाना नहीं पड़ेगा, आया ही समझें. राम-राम.
(Disclaimer: ये लेखक के अपने निजी विचार हैं. लेखक पुलिस अधिकारी हैं)
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FIRST PUBLISHED : January 21, 2024, 13:05 IST


