सोनिया मिश्रा/ चमोली. देवभूमि उत्तराखंड से ही पावन नदी गंगा का उद्गम माना जाता है. इसी देवभूमि में पांच प्रयाग हैं, जिनमें से तीसरा प्रयाग कर्ण प्रयाग है, जहां अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम होता है. जिन स्थानों पर दो नदियां मिलती हैं, उन्हें प्रयाग या संगम कहा जाता है, जो अपना धार्मिक महत्व रखता है. उत्तराखंड के चमोली जिले में कर्ण नगरी के नाम से मशहूर कर्ण प्रयाग है, जहां अलकनंदा और पिंडर का संगम होता है. साथ ही संगम का भगवान श्रीकृष्ण और कर्ण से भी खास नाता है.
मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में जब कर्ण को अर्जुन ने घायल कर दिया था, तो उसकी मृत्यु नहीं हुई थी. मान्यता है कि कर्ण के अच्छे कर्मों के कारण धर्म देवियां उनकी रक्षा कर रही थी. जब कृष्ण को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण कर कर्ण के अच्छे कर्मों को दान में मांग लिया था, जिसे कर्ण ने सहर्ष स्वीकार कर लिया.
क्या है कर्ण प्रयाग की मान्यता?
इस दान से श्रीकृष्ण कर्ण से काफी प्रसन्न हुए और उन्होंने कर्ण को वरदान मांगने को कहा. कर्ण ने उनसे ऐसी भूमि पर अपना अंतिम संस्कार किए जाने की इच्छा जताई थी, जहां पहले कभी किसी का अंतिम संस्कार न हुआ हो साथ ही और कुंती पुत्र ने कहा था कि मेरी अस्थियां वहां प्रवाहित की जाए, जहां किसी की अस्थियां विसर्जित नहीं हुई हो’. मान्यताओं के अनुसार, कर्ण की अंतिम इच्छा को मानते हुए श्रीकृष्ण ने अपनी बाईं हथेली पर चिता बनाकर कर्ण का अंतिम संस्कार किया था और कर्णप्रयाग के इसी संगम पर कर्ण की अस्थियां प्रवाहित की थीं. जिस कारण आज भी यहां लोग अपने पितरों के पिंडदान के लिए पहुंचते हैं.
कर्ण प्रयाग में पिंडदान का खास महत्व
स्थानीय जानकार आशीष थपलियाल बताते हैं कि कर्णप्रयाग पांच प्रयागों में से तीसरा प्रयाग है, जहां भगवान कृष्ण ने दानवीर कर्ण की अस्थियों को प्रवाहित किया था और आज भी संगम स्थल पर अंत्येष्टि की जाती हैं. लोग यहां अपने पितरों की अस्थियां विसर्जित करने आते हैं. वह आगे कहते हैं कि संगम में पिंडदान का बेहद खास महत्व है. मान्यता है कि संगम पर पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
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FIRST PUBLISHED : January 27, 2024, 21:54 IST
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