Carbon Credit Farming: बदलते मौसम, बढ़ते प्रदूषण और खेती की बढ़ती लागत के बीच में किसानों के लिए कमाई का एक नया रास्ता सामने आया है, जिसे कार्बन क्रेडिट कहा जाता है. दुनिया भर की बड़ी कंपनियां अपने कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने के लिए ऐसे लोगों से कार्बन खरीद रही है, जो खेती या अन्य तरीकों से प्रदूषण कम कर रहे हैं. ऐसे में यह व्यवस्था किसानों के लिए एक्स्ट्रा आमदनी का जरिया बनती जा रही है. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि कार्बन क्रेडिट क्या होता है और किसान भाई इससे अपनी कमाई कैसे बढ़ा सकते हैं.
क्या होता है कार्बन क्रेडिट?
कार्बन क्रेडिट एक तरह का सर्टिफिकेट होता है, जो बताता है कि किसी व्यक्ति या संस्था ने 1 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम किया है या उसे मिट्टी में रोक लिया है. आसान भाषा में समझे तो अगर कोई किसान अपनी खेती के तरीकों में बदलाव करके ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करता है, तो उसे इसके बदले कार्बन क्रेडिट मिलता है यह क्रेडिट खरीदा बेचा जा सकता है. जो कंपनियां तय सीमा से ज्यादा प्रदूषण करती है, वह इन क्रेडिट को खरीद कर अपने उत्सर्जन को संतुलित करती है.
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खेती में कैसे बनता है कार्बन क्रेडिट?
किसान अपनी खेती में कुछ बदलाव करके कार्बन क्रेडिट तैयार कर सकते हैं. जैसे कम जुताई या बिना जुताई की खेती, धान में कम पानी का इस्तेमाल और नई तकनीक अपनाना, पराली प्रबंधन, जैविक खाद का इस्तेमाल और मिट्टी की सेहत सुधारने वाली खेती इन तरीकों से मिट्टी में कार्बन जमा होता है और गैसों का उत्सर्जन कम होता है. इसी प्रक्रिया से कार्बन क्रेडिट बनता है.
किसान कैसे बेच सकते हैं कार्बन क्रेडिट?
किसान सीधे बाजार में कार्बन क्रेडिट नहीं बेच सकते है. इसके लिए उन्हें किसी कंपनी, संस्था या किसान उत्पादक संगठन से जुड़ना होता है. सबसे पहले किसान अपनी जमीन और खेती से जुड़ी जानकारी देते हैं. इसके बाद नई तकनीक को अपनाया जाता है और सैटेलाइट, मिट्टी जांच और मोबाइल ऐप के जरिए डाटा इकट्ठा किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया को मॉनिटरिंग रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन यानी एमआरवी कहा जाता है. थर्ड पार्टी जांच के बाद कार्बन क्रेडिट जारी होता है, फिर कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचती हैं और उसका हिस्सा किसानों को मिलता है.
कितनी हो सकती है कमाई?
1 एकड़ जमीन में साल भर में एक कार्बन क्रेडिट मिल सकता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत करीब 10 से 40 डॉलर तक होती है. इस हिसाब से किसान लगभग 800 से 3000 रुपये और कुछ मामलों में 6000 रुपये तक की एक्स्ट्रा कमाई कर सकते हैं. हालांकि इसमें रजिस्ट्रेशन, वेरीफिकेशन और दूसरे खर्च भी शामिल होते हैं, इसलिए पूरी रकम किसानों को नहीं मिलती है.
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