Shatavari Farming Tips: पारंपरिक खेती में जब मुनाफा कम होने लगा. तो यूपी के इस किसान ने कुछ ऐसा ट्राई किया जिसने सबको हैरान कर दिया. हम बात कर रहे हैं नेपाली शतावरी की खेती की जिसने एक साधारण किसान को करोड़पति बनाने की राह पर खड़ा कर दिया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी डिमांड सिर्फ भारत की मंडियों तक सीमित नहीं है.
बल्कि बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियां और दवा बनाने वाली यूनिट्स इसके लिए मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हैं. अगर आप भी लंबी रेस का घोड़ा बनना चाहते हैं और खेती को बिजनेस की तरह देखते हैं, तो शतावरी की यह नेपाली किस्म आपके लिए भारी मुनाफे वाली साबित हो सकती है.
ऐसे उगाएं नेपाली शतावरी
शतावरी की खेती उन किसानों के लिए बेस्ट है जो खेती में कुछ अलग करना चाहते हैं. इसे रेतीली या दोमट मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है जहाँ जलभराव की समस्या न हो. बुवाई के बाद इसे बहुत ज्यादा कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती. क्योंकि यह खुद में एक जड़ी-बूटी है और इसमें बीमारियां लगने का खतरा न के बराबर होता है.
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बस समय-समय पर निराई-गुड़ाई और हल्की सिंचाई का ध्यान रखना होता है. 18 महीने बाद इसकी जड़ों को खोदकर सुखा लिया जाता है, और यही सूखी जड़ें बाजार में नोटों की बारिश करती हैं. कम रिस्क और हाई-प्रॉफिट वाली यह खेती किसानों को खूब पैसे दिलवा रही है.
इतना आता है खर्च
नेपाली शतावरी को तैयार होने में करीब 18 महीने का वक्त लगता है. लेकिन जब यह फसल निकलती है. तो छप्पर फाड़कर मुनाफा देती है. एक एकड़ में लगभग 20 से 25 क्विंटल तक सूखी शतावरी हासिल की जा सकती है. लागत की बात करें तो बीज, खाद और मजदूरी मिलाकर शुरुआती खर्च थोड़ा ज्यादा लग सकता है.
इतनी होती है कमाई
इससे होने वाली कमाई की बात की जाए तो मार्केट में इसके दाम 20000 से 30000 रुपये प्रति क्विंटल तक मिलते हैं. तो सारा निवेश छोटा लगने लगता है. यह एक ऐसा फिक्स्ड डिपॉजिट है जो डेढ़ साल बाद मैच्योर होकर आपको लाखों का मालिक बना देता है.
विदेशी मार्केट में डिमांड
शतावरी की इस नेपाली किस्म की ग्लोबल मार्केट में इतनी ज्यादा डिमांड क्यों है? इसका जवाब इसकी क्वालिटी में छिपा है. दवा कंपनियां इसका इस्तेमाल इम्यूनिटी बूस्टर, टॉनिक और महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी दवाइयां बनाने में करती हैं. इस जड़ी-बूटी की जड़ें काफी मोटी और रसदार होती हैं. जिसकी वजह से इसमें औषधीय तत्व ज्यादा पाए जाते हैं.
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