Monday, February 16, 2026
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प्रकृति में गजानन—दृष्टि, साधना और सृजन का अद्भुत संगम

प्रकृति में गजानन—दृष्टि, साधना और सृजन का अद्भुत संगम

  • गजानन प्रदर्शनी में विशेष बात यह है कि पुनीत ने ये सभी छायाचित्र केवल 2 से 3 इंच के छोटे फ्रेम में क्लिक किए थे, जिन्हें प्रदर्शनी में बड़ा कर प्रस्तुत किया गया, जिससे उनकी बारीक दृष्टि और तकनीकी कुशलता स्पष्ट झलकती है।

लखनऊ,15 फरवरी 2026, गजानन, प्रथम देवता भगवान गणेश का एक अत्यंत प्रिय नाम है। “गज” अर्थात हाथी और “आनन” अर्थात मुख—अर्थात जिनका मुख हाथी के समान हो। वे बुद्धि, विवेक, शुभारंभ तथा विघ्नों को दूर करने वाले प्रथम पूज्य देव माने जाते हैं। किसी भी कार्य की शुरुआत में उनका स्मरण सफलता, मंगल और शुभ ऊर्जा का प्रतीक है। गजानन सरलता, ज्ञान और सकारात्मक चेतना के जीवंत प्रतिरूप हैं।

इसी दिव्य सकारात्मक ऊर्जा के स्वरूप गजानन के 38 विविध प्राकृतिक रूपों का अद्भुत दर्शन गत रविवार सायंकाल कला स्रोत आर्ट गैलरी में हुआ। नगर के प्रतिभाशाली छायाचित्रकार पुनीत कात्यायन ने प्रकृति में स्वतः निर्मित गजानन के विलक्षण स्वरूपों को वृक्षों के तनों पर सूक्ष्म दृष्टि से खोजते हुए 38 छायाचित्रों की विशेष प्रदर्शनी “गजानन” प्रस्तुत की। उद्घाटन पद्मश्री अनिल रस्तोगी, जय कृष्ण अग्रवाल, अनिल रिसाल सिंह, अमित टँगारी और रजनीश रावत द्वारा हुआ। वहाँ आस्था, कला और प्रकृति का अद्भुत त्रिवेणी-संगम साकार होता दिखाई दिया। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर बड़ी संख्या में कला-प्रेमी, कलाकार, छायाकार और विद्यार्थी उत्साहपूर्वक उपस्थित रहे।

पुनीत कात्यायन लखनऊ स्थित एक स्वतंत्र छायाकार, प्रतिष्ठित कलात्मक फ़ोटोग्राफ़र और विज़ुअल स्टोरीटेलर हैं, जिन्हें 15 वर्षों से अधिक की रचनात्मक साधना का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ आर्ट्स से औपचारिक कला-शिक्षा ग्रहण की और लगभग तीन दशकों तक विज्ञापन एजेंसियों में आर्ट डायरेक्टर के रूप में कार्य करते हुए अपनी दृश्य-समझ को परिपक्व किया। वर्तमान में वे एमिटी विश्वविद्यालय, लखनऊ में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में उभरते छायाकारों और दृश्य कलाकारों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

उनकी कला-दृष्टि प्रकृति, अध्यात्म और मानवीय चेतना के गहरे अंतर्संबंधों पर केंद्रित है। भारतीय परम्पराओं में वृक्ष जीवन और पवित्रता के प्रतीक रहे हैं, किंतु उपभोक्तावाद और मूल्यों से विमुखता ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को बढ़ाया है, जिसके परिणामस्वरूप ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन को प्रभावित कर रही हैं। कात्यायन की कला इसी असंतुलन के प्रति एक संवेदनशील प्रतिक्रिया है—जहाँ वे कटे, जले और क्षत-विक्षत वृक्षों में भी प्रकृति की मौन चेतावनी और दिव्यता का संकेत खोजते हैं।

उनकी चर्चित ‘ट्री बार्क सीरीज़’ में वृक्षों की छाल पर उभरी आकृतियाँ मात्र दृश्य संरचनाएँ नहीं, बल्कि प्रकृति की सृजनात्मक शक्ति का उद्घाटन प्रतीत होती हैं। ‘गजानन’ शृंखला इसी दृष्टि का आध्यात्मिक विस्तार है, जहाँ वृक्षों की बनावट में गणपति के विविध स्वरूप सहज ही दृष्टिगोचर होते हैं। ये छायाचित्र दर्शक को चौंकाते नहीं, बल्कि धीरे-धीरे भीतर उतरते हैं—मानो ध्यानावस्था में कोई रूप स्वयं प्रकट हो रहा हो। प्रकाश, बनावट और फ्रेमिंग में कृत्रिम हस्तक्षेप का अभाव इस तथ्य का साक्षी है कि यहाँ छायाकार प्रकृति को निर्देशित नहीं करता, बल्कि उसके समक्ष नतमस्तक होकर प्रतीक्षा करता है। लाल, भूरे और स्लेटी प्राकृतिक रंग भारतीय धार्मिक स्मृति को जागृत करते हैं—कहीं सिंदूरी आभा में गणपति का ललाट, तो कहीं जड़ों में उनकी सूंड का आभास उभर आता है। यह केवल देखना नहीं, बल्कि पहचानना है।

इन कृतियों का सबसे सशक्त पक्ष उनका नैतिक और वैचारिक आयाम है। घायल वृक्षों में भी दिव्य स्वरूप का दिखना एक गहरा संकेत है—मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो कि विनाश के मध्य भी सृजन शेष है। कात्यायन की छवियाँ उपदेश नहीं देतीं, बल्कि अनुभूति के माध्यम से चेतना जगाती हैं। समग्रतः ‘गजानन’ शृंखला समकालीन भारतीय छायाकला में एक विरल आध्यात्मिक हस्तक्षेप के रूप में उभरती है, जो सिद्ध करती है कि यदि दृष्टि में संवेदना हो, तो कैमरा भी साधना का माध्यम बन सकता है—और वृक्ष, एक जीवित मंदिर।

इसी संदर्भ में नगर के वरिष्ठ छायाकार अनिल रिसाल ने कहा कि फ़ोटोग्राफी ने हाल के समय में केवल तकनीकी ही नहीं, सौंदर्यबोध के स्तर पर भी सशक्त विकास किया है। एक पेशे, शौक़ और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में फ़ोटोग्राफी ने दृश्य सृजनशीलता द्वारा मानव प्रगति की कालातीत यात्रा को अंकित किया है। यह विशिष्ट तकनीक और ज्ञान से जुड़ा विज्ञान भी है और कल्पना, प्रेरणा, नवाचार तथा दृष्टि से परिपूर्ण कला भी।

उनके अनुसार फ़ोटोग्राफी उन्नीसवीं शताब्दी का सबसे प्रभावशाली आविष्कार मानी जाती है—लेखन के बाद संप्रेषण की सबसे सशक्त दृश्य भाषा। प्रकृति की अनगिनत बनावटें, रंग और रूप सौंदर्यबोध को जन्म देते हैं, और वृक्ष की छाल इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। पुनीत की प्रदर्शनी में प्रदर्शित छवियाँ इसी प्राकृतिक बनावट से प्रेरित एक विशिष्ट दृश्य संसार रचती हैं, जिनमें आश्चर्य, कल्पनाशीलता, नवाचार और त्वरित दृश्य-बोध का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

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