Wednesday, July 22, 2026
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मानसून में मचान विधि से करें खेती, कम जगह में भी मिलेगा शानदार उत्पादन


मानसून के मौसम में बेल वाली सब्जियों जैसे लौकी, तोरई, करेला, खीरा और परवल को ज़मीन पर उगाने के बजाय लकड़ी या बांस के ढांचे के सहारे ऊपर चढ़ाया जाता है. इस आसान तकनीक को ही मचान विधि कहा जाता है. इस तरीके से पौधे सीधे जमीन पर न रहकर हवा में फैलते हैं.

मानसून के मौसम में बेल वाली सब्जियों जैसे लौकी, तोरई, करेला, खीरा और परवल को ज़मीन पर उगाने के बजाय लकड़ी या बांस के ढांचे के सहारे ऊपर चढ़ाया जाता है. इस आसान तकनीक को ही मचान विधि कहा जाता है. इस तरीके से पौधे सीधे जमीन पर न रहकर हवा में फैलते हैं.

मचान विधि से खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बारिश का पानी सीधे फल और पत्तियों के संपर्क में नहीं आता. जब फल जमीन की गीली मिट्टी से दूर ऊंचे ढांचे पर लटकते हैं, तो उनके सड़ने-गलने का चांस एकदम खत्म हो जाता है. इससे फसल की क्वालिटी बेहतर रहती है और बाजार में दाम अच्छे मिलते हैं.

मचान विधि से खेती करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बारिश का पानी सीधे फल और पत्तियों के संपर्क में नहीं आता. जब फल जमीन की गीली मिट्टी से दूर ऊंचे ढांचे पर लटकते हैं, तो उनके सड़ने-गलने का चांस एकदम खत्म हो जाता है. इससे फसल की क्वालिटी बेहतर रहती है और बाजार में दाम अच्छे मिलते हैं.

कम जमीन या छोटे खेतों वाले किसानों के लिए यह तरीका किसी वरदान से कम नहीं है. चूंकि बेलें ऊपर की तरफ बढ़ती हैं. इसलिए जमीन की सतह खाली रहती है. किसान चाहें तो नीचे बची खाली जगह में धनिया, पालक जैसी पत्तेदार सब्जियां उगाकर एक साथ डबल कमाई भी कर सकते हैं.

कम जमीन या छोटे खेतों वाले किसानों के लिए यह तरीका किसी वरदान से कम नहीं है. चूंकि बेलें ऊपर की तरफ बढ़ती हैं. इसलिए जमीन की सतह खाली रहती है. किसान चाहें तो नीचे बची खाली जगह में धनिया, पालक जैसी पत्तेदार सब्जियां उगाकर एक साथ डबल कमाई भी कर सकते हैं.

इस विधि का एक और बड़ा साइंटिफिक फायदा यह है कि पौधों को भरपूर धूप और हवा मिलती रहती है. पत्तियों और तनों में हवा का सही वेंटिलेशन होने की वजह से फंगल इंफेक्शन और कीड़ों का अटैक बहुत कम हो जाता है. कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होने से खेती की लागत घटती है और शुद्ध ऑर्गेनिक फसल मिलती है.

इस विधि का एक और बड़ा साइंटिफिक फायदा यह है कि पौधों को भरपूर धूप और हवा मिलती रहती है. पत्तियों और तनों में हवा का सही वेंटिलेशन होने की वजह से फंगल इंफेक्शन और कीड़ों का अटैक बहुत कम हो जाता है. कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होने से खेती की लागत घटती है और शुद्ध ऑर्गेनिक फसल मिलती है.

मचान बनाने के लिए खेत में 6 से 8 फीट लंबे बांस के खंभे गाड़कर उन पर मजबूत तार और सूतली या प्लास्टिक का जाल बांध दिया जाता है. जब बेलें थोड़ी बड़ी होने लगती हैं. तो उन्हें धागे के सहारे धीरे-धीरे ऊपर जाल पर चढ़ा दिया जाता है. एक बार ढांचा बनने के बाद फसल संभालना काफी आसान हो जाता है.

मचान बनाने के लिए खेत में 6 से 8 फीट लंबे बांस के खंभे गाड़कर उन पर मजबूत तार और सूतली या प्लास्टिक का जाल बांध दिया जाता है. जब बेलें थोड़ी बड़ी होने लगती हैं. तो उन्हें धागे के सहारे धीरे-धीरे ऊपर जाल पर चढ़ा दिया जाता है. एक बार ढांचा बनने के बाद फसल संभालना काफी आसान हो जाता है.

बारिश में मचान विधि से की गई खेती न सिर्फ सब्जियों को बर्बादी से बचाती है. बल्कि प्रति एकड़ पैदावार को भी काफी हद तक बढ़ा देती है. अगर आप भी इस मानसून अपने खेत या गार्डन से बंपर और दाग-रहित उत्पादन पाना चाहते हैं. तो आज ही इस तकनीक को जरूर अपनाएं.

बारिश में मचान विधि से की गई खेती न सिर्फ सब्जियों को बर्बादी से बचाती है. बल्कि प्रति एकड़ पैदावार को भी काफी हद तक बढ़ा देती है. अगर आप भी इस मानसून अपने खेत या गार्डन से बंपर और दाग-रहित उत्पादन पाना चाहते हैं. तो आज ही इस तकनीक को जरूर अपनाएं.

Published at : 21 Jul 2026 05:26 PM (IST)

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