Wednesday, February 4, 2026
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सॉल्व फॉर टुमौरो 2025: एआई के ज़रिये स्वास्थ्य, स्वच्छता और वेलबीइंग को नई दिशा दे रहे हैं युवा इनोवेटर्स

सॉल्व फॉर टुमौरो 2025: एआई के ज़रिये स्वास्थ्य, स्वच्छता और वेलबीइंग को नई दिशा दे रहे हैं युवा इनोवेटर्स

हेल्थकेयर में टेक्नोलॉजी अब केवल भविष्य की बात नहीं रह गई है—यह आज ही डायग्नोस्टिक्स (जांच), देखभाल और मरीजों के जीवन की गरिमा को नया रूप दे रही है। इसी बदलाव को दर्शाते हुए सैमसंग के फ्लैगशिप सीएसआर प्रोग्राम ‘सैमसंग सॉल्व फॉर टुमौरो (एसएफटी-SFT) 2025’ ने, आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर, देशभर के हज़ारों छात्रों को एक चुनौती दी। विषय था— “स्वास्थ्य, स्वच्छता और वेलबीइंग का भविष्य”, जिसके तहत उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित और इंसान को केंद्र में रखने वाले समाधान तैयार करने थे।

 

हेल्थ इनोवेशन की नई लहर

  1. असली चुनौतियों, ज़मीनी समाधान छात्रों को ऐसे हेल्थ-टेक समाधान बनाने के लिए आमंत्रित किया गया जो सुलभ और किफायती हों। इनका उद्देश्य स्वच्छता, साफ-सफाई, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य और बीमारियों की रोकथाम जैसी चुनौतियों का हल निकालना था—ताकि बेहतर स्वास्थ्य केवल कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सबका हक बने।

 

  1. बेहतर कल के लिए व्यावहारिक तकनीक एल्‍केमिस्‍ट, बीआरएचएम, हीयर ब्राइट और पिंक ब्रिगेडियर्स जैसी टीमों ने ऐसे इनोवेशन पेश किए जो सीधे तौर पर मानवीय गरिमा और स्वास्थ्य सेवाओं की आसान पहुंच पर केंद्रित हैं। इनमें मल्टी-जॉइंट बायोनिक हाथ, बीमारियों की शुरुआती पहचान करने वाले एआई टूल्स, महिलाओं के ब्रेस्ट हेल्थ (स्तन स्वास्थ्य) की निगरानी करने वाले ऐप्स और भारत की भाषाई विविधता के हिसाब से बने स्पीच-रिकग्निशन डिवाइसेज शामिल हैं।

 

टॉप इनोवेटर्स और उनके समाधान:

  • एल्‍केमिस्‍ट (आंध्र प्रदेश): एक एआई-पावर्ड प्लेटफॉर्म जो डीप लर्निंग मॉडल की मदद से ‘सब-क्लिनिकल सिलिकोसिस’ (फेफड़ों की बीमारी) की शुरुआती चरण में ही पहचान करता है।
  • बीआरएचएम (उत्तर प्रदेश): कम लागत वाला ‘बायोनिक हाथ’, जो दिव्यांगजनों की कार्यक्षमता को लौटाने में मदद करता है।
  • हीयर ब्राइट (दिल्ली): एआई स्मार्ट ग्लास, जो बोली को लिखित टेक्स्ट में बदल देते हैं, जिससे सुनने में अक्षम लोगों को बातचीत करने में मदद मिलती है।
  • पिंक ब्रिगेडियर्स (ओडिशा): महिलाओं के लिए एक प्रेडिक्टिव एआई ऐप, जिससे वे घर बैठे ब्रेस्‍ट हेल्‍थ की सेल्फ-चेक जांच कर सकती हैं और सुरक्षित व निजी रिपोर्ट पा सकती हैं।

 

  1. थीम विनर – पैरास्‍पीक: जो बने अनसुनी आवाज़ों का सहारा चारों राष्ट्रीय विजेताओं में ‘पैरास्‍पीक’ ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। गुरुग्राम के 16 वर्षीय छात्र प्रणेत खेतान द्वारा विकसित यह कॉम्पैक्ट एआई डिवाइस, अस्पष्ट या लड़खड़ाती बोली को साफ़ और धाराप्रवाह आवाज़ में बदल देता है—वह भी हिंदी में। यह डिवाइस स्पीच डिसऑर्डर्स (बोलने में अक्षमता) से जूझ रहे लोगों से प्रेरित है। प्रणेत ने ‘डिसआर्थ्रिया’ से पीड़ित हिंदी बोलने वालों के लिए देश का पहला डेटा-सेट तैयार किया है, जो हेल्थकेयर एआई के क्षेत्र में एक बड़ी कमी को पूरा करता है।

 

  1. हेल्थ और वेलबीइंग से परे भी इनोवेशन SFT 2025 में स्वास्थ्य के अलावा अन्य क्षेत्रों के इनोवेशन को भी सम्मानित किया गया:
  • NextPlay.AI: स्पोर्ट्स कोचिंग और ट्रेनिंग के लिए एक एआई प्लेटफॉर्म।
  • Percevia (पर्सिविया): एआई-पावर्ड स्मार्ट ग्लासेस।
  • पृथ्वी रक्षक: पर्यावरण संरक्षण पर आधारित एक गेमिफाइड ऐप।

 

  1. सफलता और विस्तार के लिए पूरा सहयोग विजेता टीमों को आईआईटी दिल्ली में 1 करोड़ रुपये तक का इनक्यूबेशन सपोर्ट दिया गया। इसके अलावा, टॉप टीमों को 1 लाख रुपये की ग्रांट, ‘गुडविल अवॉर्ड’, ‘यंग इनोवेटर अवॉर्ड’ और टॉप 20 टीमों को सैमसंग गैलेक्‍सी Z फ्लिप स्मार्टफोन्स से सम्मानित किया गया।

 

  1. विस्तृत और समावेशी इनोवेशन इकोसिस्‍टम SFT 2025 में टियर-2 और टियर-3 शहरों की भागीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई। कार्यक्रम के पूर्व प्रतिभागी मेंटर के रूप में लौटे और छात्रों को आईआईटी दिल्ली की एफआईटीटी लैब्स में अपने आइडिया का प्रोटोटाइप तैयार करने का मौका मिला। यह विस्तार बताता है कि STEM शिक्षा और नवाचार अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं हैं। 2010 से अब तक, एसएफटी 68 देशों में 29 लाख से अधिक युवा इनोवेटर्स को जोड़ चुका है और भारत में ‘समस्याओं का हल खोजने वाली’ अगली पीढ़ी को तैयार करने में अहम भूमिका निभा रहा है।

 

  1. संवेदना और ज़िम्मेदारी से प्रेरित एआई डिज़ाइन-थिंकिंग वर्कशॉप्स के ज़रिये छात्रों को ऐसे एआई समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया जो न केवल स्मार्ट हों, बल्कि ज़मीनी समस्याओं को ज़िम्मेदारी के साथ हल करें। इसका मकसद तेज़ी से बदलती डिजिटल दुनिया में इनोवेशन को समाज की ज़रूरतों के साथ जोड़ना था।

 

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