Neem Pesticides: खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर खर्च हो जाता है. जो न केवल किसान की जेब पर भारी पड़ते हैं. बल्कि मिट्टी और फसल की सेहत को भी नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसे में नीम से बना जैविक कीटनाशक एक ऐसा असरदार और सस्ता ऑप्शन है. जो जीरो बजट में तैयार हो जाता है. नीम में प्राकृतिक रूप से एजाडिरैक्टिन जैसा तत्व पाया जाता है.
जो हर तरह के हानिकारक कीटों को फसल से दूर रखने में सक्षम है. अगर किसान भाई बाजार के महंगे जहर को छोड़कर इस देसी नुस्खे को अपनाते हैं. तो वे हर साल हजारों रुपये बचा सकते हैं. यह तकनीक न केवल पर्यावरण के अनुकूल है. बल्कि इससे पैदा होने वाली फसल भी पूरी तरह शुद्ध होती है. जिसकी बाजार में आजकल बहुत ज्यादा मांग है.
घर पर आसानी से तैयार करें नीम का घोल
नीम का कीटनाशक बनाना बहुत ही आसान काम है और इसके लिए आपको कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है. सबसे पहले करीब 10 से 15 किलो नीम की ताजी पत्तियां और निबौड़ी इकट्ठा कर लें. इन्हें अच्छी तरह पीसकर एक बारीक पेस्ट बना लें और फिर इसे लगभग 50 लीटर पानी में मिलाकर किसी बड़े ड्रम में रख दें.
इस मिश्रण को करीब एक हफ्ते तक छायादार जगह पर सड़ने के लिए छोड़ दें. जिससे नीम का सारा असर पानी में उतर आए. बीच-बीच में इसे किसी लकड़ी की मदद से चलाते रहें. एक हफ्ते बाद जब यह घोल पूरी तरह तैयार हो जाए. तो इसे किसी बारीक कपड़े से छान लें. यह गाढ़ा अर्क आपका शुद्ध जैविक कीटनाशक है. जिसे इस्तेमाल करना बेहद आसान है.
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कीड़ों का सफाया
नीम का यह देसी घोल फसलों पर किसी भी महंगे केमिकल से ज्यादा बेहतर तरीके से काम करता है. जब आप इसका छिड़काव करते हैं. तो इसकी कड़वाहट और स्मेल की वजह से कीट फसल के पास नहीं आते और जो कीट पहले से मौजूद होते हैं. उनकी खाने और प्रजनन की क्षमता खत्म हो जाती है. यह घोल इल्ली, सफेद मक्खी, तेला और चेपा जैसे खतरनाक कीटों पर सीधा हमला करता है.
सबसे अच्छी बात यह है कि नीम का छिड़काव करने से फसल पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता और मित्र कीट. जो फसल के लिए फायदेमंद होते हैं. वे भी सुरक्षित रहते हैं. यह तरीका लंबे समय तक फसल को सुरक्षा कवच प्रदान करता है और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी काफी हद तक बढ़ाता है.
मिट्टी की सेहत का भी फायदा
केमिकल कीटनाशकों का लगातार इस्तेमाल मिट्टी को बंजर बना देता है. लेकिन नीम का कीटनाशक मिट्टी के लिए खाद का काम भी करता है. इसके इस्तेमाल से जमीन में मौजूद फायदेमंद बैक्टीरिया खत्म नहीं होते. जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है. आर्थिक नजरिए से देखें तो यह किसानों के लिए दोहरी बचत है. एक तरफ महंगे कीटनाशकों का खर्चा बचता है. और दूसरी तरफ फसल की क्वालिटी बेहतर होने से मंडी में दाम भी अच्छे मिलते हैं.
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