Wednesday, March 4, 2026
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लीगल एक्सप्लेनर: सुप्रीम कोर्ट में जजों को ‘मॉय लॉर्ड’ सम्बोधन पर विवाद | – News in Hindi


सुप्रीम कोर्ट के जज पी. एस. नरसिम्हा ने ‘मॉय लॉर्ड’ सम्बोधन पर नाखुशी जाहिर करते हुए इसके इस्तेमाल को रोकने की बात कही है. जज साहब ने कहा कि ‘मॉय लॉर्ड’ नहीं बोला जाये तो वे अपना आधा वेतन वकील को दे सकते हैं. जस्टिस नरसिम्हा वरिष्ठता के अनुसार चार साल बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) बनेगें, इसलिए उनके इस वक्तव्य का बहुत ज्यादा महत्व है लेकिन इस बारे में कानून, वकील और जजों की धारणा में अनेक विरोधाभास हैं, जिन्हें इन 14 बिन्दुओं में समझा जा सकता है-

1. मध्यकालीन यूरोप की सामंती परम्परा – मध्यकालीन यूरोप में सामंत और जमींदार राजा की तरफ से अदालतों में फैसले देते थे इसलिए उन्हें ‘माय लॉर्ड’ कहा जाता था. सन् 1430 के आसपास में फ्रांस में रईसों के लिए मिलोर्ट शब्द का इस्तेमाल होता था. उसके एक शताब्दी के बाद इंग्लैंड में हाउस ऑफ लॉडर्स की अपील अदालत के सामंतों के लिए ‘मॉय लॉर्ड’ शब्द का इस्तेमाल होने लगा. ईस्ट इण्डिया कम्पनी और ब्रिटिश हुकुमत के माध्यम से भारत की अदालतों में इस शब्द का इस्तेमाल शुरु हुआ.

2. भारतीय संविधान और गणतंत्र – आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ब्रिटिश राजशाही की जगह गणतंत्र की स्थापना हुई. भारत Commonwealth का सदस्य है, लेकिन उपनिवेशवाद के सभी प्रतीकों की चरणबद्ध तरीके से समाप्ति हो रही है. शहर, बिल्डिंग और सड़कों के नाम बदलने के साथ औपनिवेशिक कानूनों में बदलाव होने लगे हैं. इसलिए अब अदालतों में सामंती संबोधनों पर भी रोक लगनी चाहिए.

3. वकीलों की बार काउंसिल – सन् 1961 में Advocates Act के तहत वकीलों की प्रैक्टिस के लिए अनेक मानकों को लागू करने के लिए Bar Council of India को अनेक अधिकार दिये गये. राज्यों में भी बार काउसिंल की संस्था बनी हुई हैं. बार काउंसिल के अलावा सभी अदालतों में वकीलों के लिए Bar Association संगठनों का गठन हुआ है. उत्तर भारत के राज्यों की जिला अदालतों में हुजूर, जनाब, साहब और श्रीमान जी जैसे शब्दों का वकील लोग बहुतायत में इस्तेमाल करते हैं.

4. बार काउंसिल नियमों में बदलाव – सन् 2006 में बार काउंसिल नियमों के पार्ट-6 के चैप्टर-3ए में नया सेक्शन जोड़कर मॉय लॉर्ड और Your Lordship जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर रोक की बात कही गई. इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों को Your Honour या Hon’ble Court और जिला अदालत के मजिस्ट्रेट या जजों को Sir या स्थानीय भाषा की परम्परा के अनुसार संबोधित किया जा सकता है.

5. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ऐच्छिक – इन नियमों को लागू करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया. तत्कालीन चीफ जस्टिस (CJI) सबरवाल ने कहा कि मॉय लॉर्ड सम्बोधन का मामला ऐच्छिक है और जजों के लिए वकील किसी भी तरह का सम्मानजनक सम्बोधन कर सकते हैं. तत्कालीन सॉलिसिटर जनरल (SG) वहनावति और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष ने कहा था कि बार काउंसिल के नियमों में संशोधन ऐच्छिक हैं, जिन्हें वकीलों पर बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता है.

6. सुप्रीम कोर्ट में PIL- सात साल बाद इन नियमों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने याचिका दायर की. तत्कालीन चीफ जस्टिस एच. एल. दत्तू और जस्टिस बोबड़े की बेंच ने 2014 में तकनीकी आधार पर उस याचिका को निरस्त करते हुए कहा कि वकील ‘मॉय लॉर्ड’ शब्द का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य नहीं हैं. सन् 2019 में राजस्थान हाईकोर्ट ने मॉय लॉर्ड या योर लॉर्डशिप नहीं कहने की याचिका पर नोटिस जारी करके जवाब मांगा था.

7. जजों में विरोधाभास – मद्रास हाईकोर्ट के जज के. चंदू ने सन् 2009 में वकीलों से मॉय लॉर्ड नहीं कहने का निवेदन किया था. सुप्रीम कोर्ट के जज रवीन्द्र भट्ट और उड़ीसा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मुरलीधर जब दिल्ली हाईकोर्ट में जज थे तो उन्होनें वकीलों से मॉय लॉर्ड शब्द का इस्तेमाल नहीं करने का निर्देश दिया था. पंजाब हाईकोर्ट के तत्कालीन जज अरुण कुमार त्यागी ने ऐसा ही निवेदन करते हुए ऑबलाइज्ड और ग्रेटफुल जैसे सामंती शब्दों के इस्तेमाल नहीं करने के निर्देश दिये थे.

8. गैर-जजों का Lordship के लिए मोह – Supreme Court और High Court के अलावा Tribunal में नौकरशाही की पृष्ठभूमि वाले टेक्नीकल सदस्यों को लॉर्डशिप सम्बोधन से बहुत मान का बोध होता है. ऐसे कई सदस्य और जज ‘मॉय लॉर्ड’ शब्द का सम्मान नहीं मिलने पर नाखुश हो जाते हैं. इस डर की वजह से बार काउंसिल के नियमों के बावजूद वकील लोग लॉर्डशिप कल्चर से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं. कई जज तो रिटायरमेंट के बाद भी लॉर्डशिप कहलाने में शान महसूस करते हैं.

9. महिला जजों के लिए Ladyship – लैंगिक समानता के लिहाज़ से महिला जजों को सम्बोधित करने के लिए ‘मॉय लेडी’ और ‘लेडीशिप’ जैसे शब्दों इस्तेमाल होने लगा है. गुजरात हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस सोनिया गोकानी ने फरवरी 2023 में इन शब्दों को रोक लगाने का निर्देश देते हुए महिला या पुरुष जजों के लिए समान तौर पर सर शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया था.

10. बार काउंसिल का स्पष्टीकरण – दो साल पहले ‘योर ऑनर’ के सम्बोधन से सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस (CJI) बोबड़े नाराज हो गये. उसके बाद बार काउंसिल के चेयरमैन ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा था कि सितम्बर 2019 के रिज्यूलॉशन के अनुसार वकील किसी भी सम्बोधन के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन बार काउसिंल (BCI) ने 2006 में नियमों में जो बदलाव किये थे, उन्हें अदालत ने रद्द नहीं किया है.

11. ब्रिटेन और अमेरिका में समाप्ति – इंग्लैंड में 2005 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ यूनाइटेड किंगडम की स्थापना के साथ हाउस ऑफ लॉर्ड्स (House of Lords) के अपील अधिकारों को खत्म कर दिया गया. अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार चीफ जस्टिस को मिस्टर कहकर सम्बोधित किया जा सकता है. सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया जैसे कॉमनवेल्थ के देशों में जजों को ‘योर ऑनर’ कहा जाता है.

12. राष्ट्रपति अब महामहिम नहीं – आजादी के बाद वायसराय हाउस को राष्ट्रपति भवन नाम दिया गया. लेकिन राष्ट्रपति को His Excellency की तर्ज पर महामहिम कहने की परंपरा जारी रही. प्रणव मुखर्जी ने 11 साल पहले नई प्रोटोकॉल व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति को ‘महामहिम’ या ‘हिज एक्सीलेंसी’ कहने का चलन खत्म कर दिया था. कॉलेजियम प्रणाली के तहत जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं. लेकिन Constitution की शपथ लेने वाले जज ‘मॉय लॉर्ड’ के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे.

13. अमृत पर्व पर औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति – आजादी के अमृत पर्व पर ‘India’ को ‘भारत’ कहने की मुहिम चल रही है. औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति के नाम पर नई संसद भवन का निर्माण किया गया है. दिल्ली समेत कई शहरों की सड़कों का नाम भी बदला गया है. अदालतों में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल के साथ अंग्रेजी फैसलों के हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद की शुरुआत हो रही है.

14. औपनिवेशिक परम्परा खत्म हो – राष्ट्रपति से प्रेरणा लेते हुए जजों को भी अब ‘लॉर्डशिप’ और ‘मॉय लॉर्ड’ की Colonial मानसिकता और गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति के लिए प्रयास और संकल्प करना चाहिए. बार कौंसिल के नियमों को लागू करने के लिए प्रशासनिक आदेश जारी करने के साथ जरुरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद-142 के तहत न्यायिक आदेश भी पारित करना चाहिए. इससे पूरे देश में जजों के सम्बोधन में एकरुपता आने के साथ जजों के साथ भारतीय गणतंत्र का सही अर्थों में सम्मान बढ़ेगा.

ब्लॉगर के बारे में

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 7 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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