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टाटा ट्रस्‍टस् की साझेदारी में ‘नोबेल प्राइज डायलॉग इंडिया 2025’ ने विज्ञान, समाज और युवाओं के बीच समन्वय को नई प्रेरणा दी

टाटा ट्रस्‍टस् की साझेदारी में ‘नोबेल प्राइज डायलॉग इंडिया 2025’ ने विज्ञान, समाज और युवाओं के बीच समन्वय को नई प्रेरणा दी

3 नवंबर 2025: नोबेल प्राइज़ डायलॉग इंडिया 2025 का आयोजन टाटा ट्रस्टस् के साथ विशेष साझेदारी में किया गया। यह प्रतिष्ठित कार्यक्रम भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में आयोजित हुआ, जिसमें नोबेल पुरस्कार विजेताओं, प्रमुख वैज्ञानिकों, विचारकों और छात्रों ने भाग लिया। ‘द फ्यूचर वी वांट’ विषय पर केंद्रित यह संवाद ज्ञान, समावेश, स्थिरता और आशा पर सार्थक एवं प्रेरक चर्चाओं का मंच बना।

अपने उद्घाटन संबोधन में टाटा ट्रस्‍टस् के सीईओ सिद्धार्थ ने कहा, ‘’भारत की सबसे बड़ी पूंजी उसके प्राकृतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके लोगों की शक्ति और सीखने की क्षमता में निहित है। इसी दृष्टि से टाटा ट्रस्टस् ने उत्कृष्टता के केंद्रों को सशक्त बनाने की विरासत विकसित की है। नोबेल प्राइज़ आउटरीच के साथ हमारी साझेदारी इसी साझा विश्वास पर आधारित है कि ज्ञान का उपयोग मानवता की सेवा के लिए किया जाना चाहिए।

आज भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भविष्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय से परिपूर्ण होगा, और इसे साकार करने के लिए हमें युवाओं को सशक्त बनाना होगा तथा नवाचार को उन तक पहुँचाना होगा जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
आज हम इस प्रतिबद्धता को दोहराते हुए इस महत्वपूर्ण संवाद की मेजबानी करने पर सम्मानित महसूस कर रहे हैं।‘’

नोबेल पुरस्कार विजेता डेविड मैकमिलन (केमिस्ट्री, 2021) ने अपने विचार साझा करते हुए ऑर्गेनोकैटेलिसिस और महान विचारों की शक्ति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, ‘’ हम जलवायु परिवर्तन के समाधान से बस एक कैटेलिटिक प्रतिक्रिया दूर हैं। हमें दुनिया को यह समझाने का बेहतर प्रयास करना होगा कि ये वैज्ञानिक क्षेत्र कितने निर्णायक हैं, क्योंकि हम वास्तव में समाधान के बेहद करीब हैं।‘’

भारत में अपने अनुभव को साझा करते हुए मैकमिलन ने कहा, ‘’ मैं पहली बार भारत आया हूँ और यहाँ का अनुभव अविश्वसनीय रहा है। देश में सशक्त ऊर्जा, आत्मविश्वास और आकांक्षा का वातावरण महसूस होता है। यह वास्तव में भारत का समय है — और भारत इसे भली-भाँति जानता है।‘’

नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स रॉबिन्सन (इकोनॉमिक साइंसेज़, 2024) ने समृद्धि और प्रगति के इस निर्णायक क्षण पर विचार साझा करते हुए कहा कि समाज तभी प्रगति करते हैं जब वे संस्कृतियों के बीच विचारों और अनुभवों का मुक्त आदान-प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा, ‘’यदि आप मौजूदा संस्कृतियों को देखें, तो वे किसी एकतरफा रास्ते पर नहीं चलतीं। यह एक दोतरफा या बहु-तरफा सड़क है — जहाँ हर कोई एक-दूसरे से सीखता है, उधार लेता है, मेलजोल करता है, मिश्रण करता है और पुनः सृजन करता है।‘’

अपने व्याख्यान में शहरी महामारी विज्ञानी टोलुला ओनी ने ‘आशा’ के विषय पर बात की। उन्होंने युवाओं की उस बुद्धिमत्ता पर बल दिया जो भविष्य को पुनः कल्पित करने में सक्षम है। उन्होंने ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया को अधिक सहभागी और समावेशी बनाने की आवश्यकता बताई और युवाओं को वह मंच देने की आवश्यकता बताई, जहाँ वे अपने मनचाहे भविष्य पर अपनी राय व्यक्त कर सकें।

भारत के योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने रॉबिन्सन और ओनी के साथ एक पैनल चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि दुनिया की बहुआयामी विकास चुनौतियों का समाधान अत्यंत जटिल और बहु-स्तरीय है।

माइक्रोबायोलॉजिस्ट गगनदीप कांग ने वैश्विक स्वास्थ्य खतरों और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और टीका-विकास में भारत के अग्रणी योगदान से जुड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ साझा कीं। कार्यक्रम के समापन पैनल में डेविड मैकमिलन, गगनदीप कांग और बायोटेक उद्यमी कुश परमार शामिल थे। उन्होंने चर्चा की कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी मानवता तथा पृथ्वी — दोनों के लिए कल्याण का माध्यम कैसे बन सकते हैं। इन सत्रों का संचालन ओवेन गैफनी, चीफ इम्पैक्ट ऑफिसर, नोबेल प्राइज़ आउटरीच, और जयराम चेंगलुर, डायरेक्‍टर,  टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ने किया।

सहयोग की भावना पर विचार साझा करते हुए नोबेल फाउंडेशन की एक्‍जक्‍यूटिव डायरेक्‍टर हन्ना स्टयार्ने ने कहा, ‘’पूरे दिन छात्रों और विशेषज्ञों के साथ बातचीत करना और उन्हें सुनना वास्तव में प्रेरणादायक अनुभव रहा। समान चुनौतियों पर विचार करते हुए, सीमाओं के पार नए विचारों का आदान-प्रदान करके और एक-दूसरे से सीखते हुए हम एक ऐसा संवाद रचते हैं जो वास्तव में बदलाव लाता है।‘’

कार्यक्रम में संवाद की भावना को दर्शाने वाला एक विशेष आर्ट इंस्टॉलेशन — ‘पराग आर्ट वॉल’ भी प्रस्तुत किया गया। यह एक सामूहिक कलाकृति थी जिसे बेंगलुरु, कर्नाटक के कोप्पल गाँव और मुंबई की एक झुग्गी बस्ती के 200 युवा बच्चों ने मिलकर तैयार किया। इस प्रदर्शनी ने उन रंगीन कल्पनाओं को रूप दिया, जिनके ज़रिए बच्चे अपने और अपने देश के भविष्य की तस्वीर बनाते हैं।

कार्यक्रम ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी उत्सव मनाया, जिसमें प्रसिद्ध वायलिन वादक डॉ. एल. सुब्रमण्यम ने संगीत और विज्ञान के संगम को दर्शाने वाला मंत्रमुग्ध कर देने वाला प्रदर्शन दिया। प्रसिद्ध गायिका कविता कृष्णमूर्ति ने भी अपने सुमधुर सुरों से कार्यक्रम को यादगार बना दिया।

नोबेल प्राइज़ डायलॉग इंडिया 2025 का अगला चरण 5 नवंबर को मुंबई में आयोजित होगा, जहाँ कॉर्पोरेट जगत के वरिष्ठ प्रतिनिधि और नीति-निर्माता एकत्र होंगे ताकि विज्ञान और सहानुभूति पर आधारित भविष्य के निर्माण में परोपकार और संस्थागत विकास की भूमिका पर गहन चर्चा की जा सके।

 

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