Eucalyptus Tree: यूकेलिप्टस का पेड़ भारत के ग्रामीण इलाकों में बहुत लोकप्रिय है. कई किसान इसे कम समय में अधिक कमाई का जरिया मानते हैं. हालांकि, यूकेलिप्टस को लेकर अक्सर कहा जाता है कि यह पेड़ खेती को बर्बाद कर देता है. यूकेलिप्टस के पेड़ को पानी का दुश्मन कहा जाता है. इसकी जड़ें जमीन में बहुत गहराई तक जाती हैं, जिससे यह पेड़ आस-पास के भूमिगत जल को बहुत तेजी से सोखता है.
एक अनुमान के मुताबिक, एक बड़ा यूकेलिप्टस का पेड़ रोजाना कई लीटर पानी पी जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि आस-पास के कुएं, नलकूप और खेतों की नमी खत्म होने लगती है. यदि आप इसके पास कोई दूसरी फसल बोते हैं तो उसे पानी की कमी से जूझना पड़ता है.
मिट्टी से खींच लेता है पोषक तत्व
यूकेलिप्टस केवल पानी ही नहीं, बल्कि मिट्टी के सारे पोषक तत्व भी खुद खींच लेता है. इसकी पत्तियां जब जमीन पर गिरती हैं तो वे आसानी से सड़ती नहीं हैं. इन पत्तियों में कुछ ऐसे रासायनिक तत्व होते हैं जो मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को कम कर देते हैं. इस प्रक्रिया को एलेलोपैथी (Allelopathy) कहते हैं. इसका मतलब है कि यूकेलिप्टस अपने आस-पास किसी दूसरे पौधे या फसल को पनपने भी नहीं देता है. इसके पास उगाई गई गेहूं, धान या सब्जियों की पैदावार आधी हो जाती है.
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पर्यावरण का विलेन है यह पेड़
यह पेड़ केवल खेती को ही नहीं, बल्कि स्थानीय पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है. यूकेलिप्टस के पेड़ों पर स्थानीय पक्षी अपने घोंसले बनाना पसंद नहीं करते क्योंकि इससे उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है. यह जैव बायोडाइवर्सिटि के लिए अच्छा नहीं माना जाता है.
क्या है इसको लगाने की समझदारी?
यूकेलिप्टस पूरी तरह से खराब नहीं है, बशर्ते इसे सही जगह लगाया जाए. अगर आप इसे उपजाऊ खेत के बीच में लगाएंगे तो यह खेती को बर्बाद कर देगा. समझदारी इसी में है कि इसे खेत की मुख्य जमीन पर न लगाकर, बंजर जमीन या जलभराव वाले इलाकों में लगाया जाए जहां पानी सोखने की जरूरत हो.


