Isabgol Farming: ईसबगोल की खेती किसानों के लिए कम लागत में अच्छी कमाई का ऑप्शन बनकर उभर रही है. पारंपरिक फसलों के मुकाबले यह एक ऐसी औषधीय फसल है, जिसकी बाजार में लगातार मांग बनी रहती है. खास बात यह है इसकी खेती में ज्यादा समय नहीं लगता और फसल तैयार होने के बाद भूसी और दूसरे उत्पादों से अलग-अलग स्तर पर आय प्राप्त की जा सकती है. राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश के कई किसान अब ईसबगोल की खेती की ओर रुख कर रहे हैं. ईसबगोल औषधीय पौधा है, जिसकी बालियां गेहूं की तरह दिखाई देती है. इसके बीजों पर मौजूद भूसी में पानी सोखने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है. यही भूसी दवाइयाें और स्वास्थ्य उत्पादन में इस्तेमाल की जाती है. इसके अलावा पौधे की पत्तियां पशुओं के चारे के रूप में भी काम आती है, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलता है.
किस मिट्टी और जलवायु में होती है अच्छी खेती?
एक्सपर्ट्स के अनुसार ईसबगोल की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए और मिट्टी का पीएच मान सामान्य या 6 से 7 के बीच होना बेहतर माना जाता है. ज्यादा नमी वाली जमीन में इसके पौधों का विकास प्रभावित हो सकता है. फसल की बुवाई के लिए अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के दूसरे सप्ताह तक का समय सबसे अच्छा माना जाता है. बहुत देर से बुवाई करने पर उत्पादन घट सकता है.
बुवाई से पहले क्या करें?
ईसबगोल के बीज काफी छोटे होते हैं, इसलिए उन्हें रेत में मिलाकर बोया जाता है. बीजों की बुवाई से पहले फफूंदी नाशक दवा से उपचारित करना जरूरी माना जाता है, ताकि जड़ गलन और दूसरे रोगों से बचाव हो सके. कतार से कतार की दूरी लगभग 25 से 30 सेंटीमीटर रखी जाती है. बीजों को ज्यादा गहराई पर नहीं बोना चाहिए. वहीं खेत की अच्छी तरह जुताई पर मिट्टी को भुरभुरी बनाना जरूरी होता है.
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कैसे करें फसल की देखभाल?
अच्छी पैदावार के लिए समय-समय पर सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण और पौधों की निगरानी जरूरी होती है. सामान्य तौर पर फसल को पूरे जीवन काल में तीन से चार सिंचाई की आवश्यकता होती है. खरपतवार नियंत्रण के लिए दो से तीन बार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए. जैविक खेती करने वाले किसान गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट जैसी खाद का उपयोग कर सकते हैं. वहीं ईसबगोल को तुलासिता और विल्ट जैसे रोगों का खतरा रहता है. रोग नियंत्रण के लिए बीज उपचार और खेत की स्वच्छता जरूरी मानी जाती है. ऐसे में एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि कतारों के बीच पर्याप्त दूरी रखी जाए और फसलों में ज्यादा नमी न रहने दी जाए.
फसल तैयारी का समय और कमाई
ईसबगोल की फसल सामान्य तौर पर 110 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है. जब बलिया पूरी तरह पक जाए तो साफ मौसम में कटाई करनी चाहिए. कटाई के दौरान बारिश होने पर बीज झड़ने और भूसी खराब होने का खतरा बढ़ जाता है. कृषि एक्सपर्ट के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र से 10 से 15 क्विंटल तक ईसबगोल का उत्पादन किया जा सकता है. बाजार में इसके बीजों का भाव अक्सर 8,500 से लेकर 15,000 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल जाता है. इसके अलावा ईसबगोल की भूसी की मांग भी काफी रहती है, कई क्षेत्र में इसकी कीमत 25,000 प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है.
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