नीट पेपर लीक 2026 को लेकर देशभर में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा और प्रह्लाद जोशी को देश का नया शिक्षा मंत्री बनाया गया। इसी बीच लोगों का ध्यान आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की ओर गया, जिनकी कहानी आज भी उतनी ही प्रेरणादायक है।
इस वक्त भारत में एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चर्चा हो रही है। परीक्षाओं, शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मुद्दे लगातार बहस का विषय बने हुए हैं। हाल ही में शिक्षा मंत्रालय में बड़ा बदलाव हुआ है। नीट पेपर लीक 2026 को लेकर देशभर में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा और प्रह्लाद जोशी को देश का नया शिक्षा मंत्री बनाया गया। इसी बीच लोगों का ध्यान आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की ओर गया, जिनकी कहानी आज भी उतनी ही प्रेरणादायक है। वे कभी किसी स्कूल या कॉलेज में नहीं गए, लेकिन उन्होंने ही IIT, UGC जैसी संस्थाओं की नींव रखने और आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आजाद भारत की शिक्षा व्यवस्था की रखी नींव
जी हां, भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम अजाद का जीवन इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि सीखने की कोई तय सीमा नहीं होती। हैरानी की बात यह है कि वे अपने जीवन में कभी किसी स्कूल या मदरसे में पढ़ने नहीं गए। इसके बावजूद उन्होंने आजाद भारत की शिक्षा व्यवस्था की मजबूत नींव रखी और देश को ऐसी संस्थाएं दीं, जो आज भी उच्च शिक्षा की पहचान हैं। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, ‘मेरे पिता पुराने विचारों के व्यक्ति थे। उन्हें पश्चिमी शिक्षा पर विश्वास नहीं था।” उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन ने उन्हें न तो किसी स्कूल में भेजा और न ही मदरसे में दाखिला दिलाया। उन्होंने तय किया कि वे अपने बेटे की शिक्षा घर पर ही देंगे। जो बच्चा कभी किसी स्कूल या कक्षा में नहीं गया, वही आगे चलकर आजाद भारत का पहला शिक्षा मंत्री बनेगा यह किसी ने भी नहीं सोचा था। उन्होंने लगातार 11 वर्षों तक देश की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा दी और आधुनिक भारत की शिक्षा प्रणाली की मजबूत नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मिलिए मौलाना अबुल कलाम आजाद से
मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को सऊदी अरब के मक्का शहर में एक भारतीय परिवार में हुआ था। भारत में 1857 की असफल क्रांति के बाद उनका परिवार मक्का चला गया था। उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन साल 1898 में परिवार सहित भारत लौट आए और कलकत्ता में बस गए। आजाद को बचपन से ही किताबों से लगाव था। 10 साल की उम्र से पहले ही मौलाना अबुल कलाम आजाद ने फारसी शब्दकोश पर काम शुरू कर दिया था। इतिहासकार एस. इरफान हबीब के अनुसार, उन्होंने 12 साल की उम्र तक अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी कर ली थी। किशोरावस्था में ही वे कविताएं लिखने लगे और काव्य पत्रिका प्रकाशित करने लगे। महज 15 साल की उम्र में उन्होंने ‘लिसान-उस-सिद्क’ नामक मासिक पत्रिका का संपादन भी संभाल लिया।
महात्मा गांधी से मिलने और कांग्रेस में शामिल होने से पहले ही आजाद अपनी लेखनी के जरिए अंग्रेजी हुकूमत का विरोध कर रहे थे। महज 35 साल की उम्र में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने। उन्होंने देश के बंटवारे का खुलकर विरोध किया। विभाजन के बाद जब कई मुसलमान डर के कारण भारत छोड़ने की सोच रहे थे, तब उन्होंने दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों से भावुक अपील की कि वे अपना देश छोड़कर न जाएं।
शिक्षा मंत्री के रूप में बड़ा योगदान
मौलाना अबुल कलाम आजाद अगस्त 1947 में आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने और फरवरी 1958 में निधन तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में देश में शिक्षा के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक कदम उठाए गए। इसी दौरान आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना हुई।
पिता ने कराई खुद पढ़ाई
अपनी आत्मकथा ‘इंडिया विंस फ्रीडम’ में मौलाना आजाद ने लिखा कि उनके पिता ने उनकी पूरी शिक्षा घर पर ही कराई। शुरुआत में उनके पिता ने खुद उन्हें पढ़ाया, बाद में अलग-अलग विषयों के लिए विद्वान शिक्षकों की व्यवस्था की, ताकि हर विषय की अच्छी शिक्षा मिल सके। इसलिए यह कहना गलत होगा कि मौलाना आजाद अशिक्षित थे। उन्होंने भले ही कभी किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई नहीं की, लेकिन घर पर ही उन्होंने इतनी गहरी और व्यापक शिक्षा हासिल की कि वे अपने समय के सबसे बड़े विद्वानों में गिने जाने लगे।
मौलाना अबुल कमाल अजाद का करियर सफर
मौलाना अबुल कलाम आजाद ने बहुत कम उम्र में ही सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कर दी थी। जब ज्यादातर बच्चे स्कूल की पढ़ाई कर रहे होते हैं, तब सिर्फ 15 साल की उम्र में उन्होंने ‘लिसान-उस-सिद्क’ नाम से एक साहित्यिक और वैचारिक मासिक पत्रिका शुरू की। उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि लोग उनकी रचनाएं पढ़कर यह मानने को तैयार नहीं होते थे कि इन्हें एक किशोर ने लिखा है।
पत्रकारिता को बनाया अंग्रेजों के खिलाफ हथियार
साल 1912 में मौलाना आजाद ने उर्दू अखबार ‘अल-हिलाल’ की शुरुआत की। यह अखबार अंग्रेजी शासन की नीतियों की खुलकर आलोचना करता था। साथ ही, यह उन लोगों को भी जागरूक करता था जो अंग्रेजों को अपना हितैषी मानते थे। आजाद का मानना था कि भारत की आजादी तभी संभव है, जब हिंदू और मुसलमान मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करें। उनकी बेबाक पत्रकारिता से ब्रिटिश सरकार घबरा गई। सरकार ने अखबार पर जुर्माने लगाए और कई तरह की पाबंदियां लगाईं। लगातार बढ़ते दबाव के कारण उन्हें ‘अल-हिलाल’ बंद करना पड़ा।
इसके बाद 1915 में उन्होंने ‘अल-बलाग’ नाम से नया अखबार शुरू किया, लेकिन अंग्रेज सरकार ने इसे भी ज्यादा समय तक नहीं चलने दिया। 1916 में उन्हें झारखंड के रांची के पास मोराबादी में नजरबंद (निर्वासित) कर दिया गया, जिसके कारण यह अखबार भी बंद करना पड़ा।
कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने
पत्रकारिता ने मौलाना आजाद को एक बड़े राजनीतिक नेता के रूप में पहचान दिलाई। बाद में वे महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और कई बार जेल भी गए। साल 1923 में, सिर्फ 35 साल की उम्र में, वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए। उस समय कांग्रेस के भीतर रणनीति को लेकर मतभेद थे, लेकिन मौलाना आजाद ने सभी पक्षों के बीच सहमति बनाकर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालांकि, इस कहानी का उद्देश्य यह कहना नहीं है कि औपचारिक शिक्षा या डिग्री की कोई अहमियत नहीं है। बल्कि इसका मकसद यह समझाना है कि घर पर पढ़ाई करने वाले एक विद्वान ने अपनी दूरदर्शिता, ज्ञान और नेतृत्व के दम पर ऐसी संस्थाओं की स्थापना में अहम भूमिका निभाई, जिन्होंने आजादी के बाद करोड़ों भारतीयों की शिक्षा और भविष्य को नई दिशा दी।
आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती
जब भारत आजाद हुआ, तब देश के सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं। गरीबी, अशिक्षा, विभाजन का दर्द, स्कूलों की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव और कमजोर उच्च शिक्षा व्यवस्था जैसी समस्याएं थीं। ऐसे समय में पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का मानना था कि सिर्फ राजनीतिक आजादी काफी नहीं है, देश को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ तैयार करना भी जरूरी है।
IIT खड़गपुर की स्थापना में निभाई अहम भूमिका
आजादी के बाद देश का पहला आईआईटी आईआईटी खड़गपुर 1951 में शुरू हुआ। यह संस्थान उस जगह बनाया गया, जहां अंग्रेजों के समय स्वतंत्रता सेनानियों को कैद रखा जाता था। संसाधनों की कमी के बावजूद मौलाना आजाद ने इसकी स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इंडिया टूडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने उद्घाटन समारोह में कहा था कि भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से साहित्य और पारंपरिक पढ़ाई तक सीमित थी। देश को आगे बढ़ाने के लिए उच्च स्तर के वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत है। उन्होंने यह सपना भी व्यक्त किया कि एक दिन ऐसा आएगा, जब दुनिया के दूसरे देशों के छात्र तकनीकी शिक्षा के लिए भारत आएंगे। हालांकि, आईआईटी की स्थापना का श्रेय केवल मौलाना आजाद को नहीं दिया जा सकता। इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, वैज्ञानिकों, विभिन्न समितियों और राज्य सरकारों का भी अहम योगदान था। लेकिन शिक्षा मंत्री के रूप में आजाद ने इस सोच को सरकारी नीति का हिस्सा बनाया और तकनीकी शिक्षा के विस्तार को प्राथमिकता दी।
UGC और उच्च शिक्षा को मिली नई दिशा
मौलाना आजाद का मानना था कि हायर एजुकेशन सिर्फ अमीर या चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वे चाहते थे कि हर व्यक्ति को अच्छी शिक्षा का अवसर मिले। उन्होंने मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, वयस्क साक्षरता, शिक्षकों के प्रशिक्षण और शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाने पर जोर दिया। उनके कार्यकाल में शिक्षा बजट लगभग 2 करोड़ रुपये से बढ़कर 30 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। 1948 में उन्होंने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन किया। इसी आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापना हुई, जिसे 1956 में कानूनी दर्जा मिला। UGC ने देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


