Monday, August 3, 2026
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बहन के कैंसर से मिली प्रेरणा, कबाड़ बीनने वाले के बेटे ने क्रैक किया NEET; आई इतनी रैंक, Career Hindi News


सागर बताते हैं कि उनका परिवार बड़ा है और उसमें ज्यादातर लोग अनपढ़ हैं। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण परिवार के कई लोग नशे की लत का शिकार हो गए। इसी दौरान उनकी चचेरी बहन (बुआ की बेटी) लंबे समय तक गुटखा खाने की वजह से कैंसर से पीड़ित हो गई।

राजस्थान के कोटा जिले के कैथून कस्बे के पास स्थित गोडल्याहेड़ी गांव के रहने वाले सागर रेगर की कहानी काफी दिलचस्प और प्रेरणादायक है। सागर बेहद गरीब परिवार से आते हैं। लेकिन पढ़ाई में वो तेज थे। उन्होंने बचपन में डॉक्टर बनने का सपना देखा। हालांकि उनके परिवार या रिश्तेदारों में कोई डॉक्टर नहीं था। लेकिन बहन कैंसर पीड़ित थी और बहन का दर्द उनसे देखा नहीं गया। बस यहीं से उन्होंने डॉक्टर बनने का दृढ़ संकल्प लिया। हालांकि सागर के पास इतनी गरीबी थी, वो महंगी कोचिंग में दाखिला नहीं ले सकते हैं। पिता कबाड़ी का काम करते थे। मगर, गरीबी और संघर्ष के बीच पले-बढ़े सागर ने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी। उन्होंने न केवल डॉक्टर बनने का सपना देखा, बल्कि अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर उस सपने को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम भी बढ़ाया। उन्होंने नीट की परीक्षा को पास कर लिया है। हालांकि यहां तक उनका सफर आसान नहीं था।

NEET में शानदार सफलता

सागर ने NEET-UG परीक्षा में 564 अंक हासिल किए और 98.6296 पर्सेंटाइल प्राप्त की। उन्हें ऑल इंडिया रैंक (AIR) 27,157 मिली, जबकि एससी (SC) श्रेणी में उनकी AIR 684 रही। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई कैथून के सरकारी स्कूल से की। सागर ने 10वीं कक्षा में 76% और 12वीं कक्षा में 92% अंक हासिल किए।

नशे की वजह से बहन को हुआ कैंसर

इंडिया टूडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, सागर बताते हैं कि उनका परिवार बड़ा है और उसमें ज्यादातर लोग अनपढ़ हैं। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण परिवार के कई लोग नशे की लत का शिकार हो गए। इसी दौरान उनकी चचेरी बहन (बुआ की बेटी) लंबे समय तक गुटखा खाने की वजह से कैंसर से पीड़ित हो गई। इस घटना ने सागर को गहराई से झकझोर दिया और यहां से उनके भीतर डॉक्टर बनने का का संकल्प लिया।

इस योजना ने बदल दी जिंदगी

सागर बताते हैं कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उनके पिता ने साफ कह दिया था कि वे मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी का खर्च नहीं उठा सकते। ऐसे कठिन समय में कैथून के सरकारी स्कूल के प्राचार्य ने उनका मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा संबल योजना के बारे में बताया। प्राचार्य की सलाह पर सागर ने योजना की चयन परीक्षा दी और उसमें सफल हो गए। यही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।

मिली ये सुविधाएं

योजना के तहत सागर को एक साल तक NEET की मुफ्त कोचिंग, रहने की व्यवस्था और भोजन की सुविधा मिली। एल.एन. माहेश्वरी परमार्थ न्यास ने उन्हें निःशुल्क आवास और भोजन उपलब्ध कराया, जिससे वह बिना किसी आर्थिक चिंता के पूरी तरह पढ़ाई पर ध्यान दे सके और अपने साथ-साथ परिवार का सपना भी पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ सके।

हिंदी माध्यम के छात्रों को आगे बढ़ाने की पहल

एल.एन. माहेश्वरी परमार्थ न्यास के ट्रस्टी और ALLEN के संस्थापक नवीन माहेश्वरी ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य सरकारी स्कूलों के हिंदी माध्यम के मेधावी छात्रों की पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना है। उनका कहना है कि जब ऐसे छात्र सफलता हासिल करते हैं तो उसका असर केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज प्रेरित होता है और हजारों अन्य बच्चों को भी आगे बढ़ने की उम्मीद मिलती है।

दो कमरों के घर से डॉक्टर बनने के सफर तक

सागर के पिता मुरली रेगर घर-घर जाकर कबाड़ इकट्ठा करके पूरे परिवार का पालन-पोषण करते हैं। सागर की मां गृहिणी हैं। पिता जब कबाड़ लेकर घर लौटते हैं तो मां उसे अलग-अलग छांटने में उनकी मदद करती हैं। पूरा परिवार दो कमरों के एक साधारण घर में रहता है। सागर की दो छोटी बहनें भी हैं। बड़ी बहन मानसी 12वीं कक्षा में बायोलॉजी की पढ़ाई कर रही हैं, जबकि सबसे छोटी बहन इशिका 10वीं कक्षा की छात्रा हैं।

सागर का कहना है कि यदि उन्हें शिक्षा संबल योजना का अवसर नहीं मिला होता तो मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना उनके लिए लगभग असंभव था और मजबूरी में उन्हें बीएससी (BSc) में दाखिला लेना पड़ता। हालांकि, उनके पिता अशिक्षित हैं और मां ने केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है, फिर भी दोनों ने हमेशा शिक्षा का महत्व समझा और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटे को अपने सपने पूरे करने के लिए लगातार प्रेरित किया। आज इसी हौसले, माता-पिता के समर्थन और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर कबाड़ बीनने वाले का बेटा डॉक्टर बनने की दहलीज पर खड़ा है।



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