Foreign Medical Licensing Exams: देश के हजारों एमबीबीएस पास डॉक्टर अमेरिका की USMLE और ब्रिटेन की PLAB जैसी विदेशी परीक्षाओं से बाहर हो रहे हैं। जानिए क्या है पूरा मामला।
Foreign Medical Licensing Exams: भारत से एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई पूरी करने के बाद हर साल हजारों युवा डॉक्टर विदेश जाकर प्रैक्टिस करने या हायर एजुकेशन हासिल करने का सपना देखते हैं। अमेरिका में डॉक्टरी के लिए USMLE और ब्रिटेन (UK) में प्रैक्टिस के लिए PLAB या ऑस्ट्रेलिया में AMC जैसी कठिन विदेशी लाइसेंसिंग परीक्षाएं पास करनी होती हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कई एमबीबीएस (MBBS) ग्रेजुएट्स इन परीक्षाओं में बैठने की योग्यता हासिल नहीं कर पा रहे हैं। इस अड़चन के पीछे कई प्रशासनिक, रेगुलेटरी और मान्यता संबंधी नियम शामिल हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि छात्रों के सामने यह समस्या क्यों आ रही है।
NMC के नए नियम और 2-साल की अनिवार्य इंटर्नशिप
विदेशों जैसे रूस, यूक्रेन, कजाकिस्तान या चीन से एमबीबीएस करके लौटने वाले भारतीय छात्रों को भारत में लाइसेंस पाने और प्रैक्टिस करने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों का पालन करना पड़ता है।
एनएमसी के एफएमजीई (FMGE) और नेशनल एग्जिट टेस्ट (NEXT) से जुड़े नियमों के तहत, विदेशों से पढ़े कई छात्रों को भारत में 2 साल की अनिवार्य इंटर्नशिप करनी पड़ रही है। कई अंतरराष्ट्रीय लाइसेंसिंग एजेंसियां अपने यहां आवेदन स्वीकार करने के लिए यह शर्त रखती हैं कि छात्र की डिग्री उनके देश के नियमों के अनुरूप समय सीमा में पूरी हो। लंबी इंटर्नशिप और नियमों के फेर में देरी होने से छात्र कई विदेशी परीक्षाओं के लिए पात्र होने की समय सीमा गंवा देते हैं।
वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन (WFME) मान्यता की शर्त
अमेरिका में डॉक्टरी के लाइसेंस के लिए ईसीएफएमजी (ECFMG) ने एक महत्वपूर्ण नियम लागू किया है। केवल वही अभ्यर्थी USMLE परीक्षा देने या अमेरिका में रेजीडेंसी के लिए पात्र होंगे जिनके मेडिकल कॉलेज को WFME द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था से एक्रिडिटेशन मिला हो।
भारत के राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) को WFME की मान्यता मिल चुकी है, लेकिन कई हाल ही में खुले नए मेडिकल कॉलेजों को यदि सही समय पर यह मान्यता नहीं मिलती, तो वहां से पढ़े ग्रेजुएट्स परीक्षा से बाहर हो जाते हैं।
डिग्री की निरंतरता और विदेशी संस्थानों के कड़े नियम
विदेशी लाइसेंसिंग बोर्ड जैसे ब्रिटेन का GMC या अमेरिका का ECFMG यह सुनिश्चित करते हैं कि अभ्यर्थी की पूरी शिक्षा बिना किसी ब्रेक के एक ही इंस्टीट्यूट या मान्यता प्राप्त मानकों के तहत पूरी हुई हो।
यदि किसी छात्र ने ऑनलाइन मोड में क्लिनिकल क्लासेस ली हैं या महामारी/युद्ध जैसी स्थितियों के कारण बीच में यूनिवर्सिटी ट्रांसफर लिया है, तो विदेशी एजेंसियां उस डिग्री को पूर्ण मान्यता देने से इंकार कर देती हैं।
भाषा और क्लिनिकल एक्सपीरियंस की कमी
विदेशी लाइसेंसिंग एग्जाम में सीधे बैठने से पहले छात्रों को IELTS या OET जैसी भाषा परीक्षाएं पास करनी होती हैं। साथ ही, विदेशी बोर्ड भारत या अन्य देशों की इंटर्नशिप के दौरान मिले क्लिनिकल एक्सपीरियंस का मिलान अपने मानकों से करते हैं। मानकों में अंतर होने पर आवेदन रद्द हो जाता है।
छात्रों के लिए जरूरी सलाह
मेडिकल में दाखिला लेने से पहले छात्रों को यह जांचना चाहिए कि उनका कॉलेज WDOMS और NMC की वैलिड लिस्ट में शामिल है या नहीं। यदि आपका लक्ष्य विदेश में करियर बनाना है, तो शुरुआत से ही उस देश की नियामक संस्था के एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया को ट्रैक करना बेहद आवश्यक है।


