10वीं में सिर्फ 52% अंक पाने वाले राहुल सिन्हा को IIT और IIM में लगातार असफलता मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 34 वर्ष की उम्र में BPSC की तैयारी शुरू कर 12 साल के संघर्ष, आर्थिक तंगी और सामाजिक तानों के बावजूद SDM बनने का सपना पूरा कर दिखाया।
आज के समय में 10वीं 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में कम नंबर आने पर छात्र निराश हो जाते हैं। प्रवेश या भर्ती परीक्षाओं की तैयारी में बार बार असफलता मिलने पर भी लाखों उम्मीदवार मायूस होकर तनाव में चले जाते हैं और हार मान लेते हैं। ऐसे विद्यार्थियों को लगता है जैसे सब कुछ खत्म हो गया। हताशा के अंधेरे में डूबे ऐसे युवाओं के लिए बिहार के एसडीएम राहुल सिन्हा की कहानी काफी सीख देने वाली है। हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर करते हुए उन्होंने अपने 12 साल के संघर्ष को बताते हुए कहा कि उन्हें 10वीं में केवल 52 प्रतिशत नंबर ही मिले थे लेकिन 12 साल की जीतोड़ मेहनत के बाद वह अफसर बन गए। राहुल सिन्हा बताते हैं कि उन्होंने तीन बार IIT की परीक्षा भी दी लेकिन वह उसमें सफल नहीं हो पाए। बाद में उन्होंने BPSC पास कर ली।
यहां हम आपको बताते हैं कि कई असफलताओं और सामाजिक तानों का सामना करते हुए आखिरकार राहुल सिन्हा का एसडीएम (SDM) बनने का अपना सपना कैसे पूरा हुआ।
10वीं में मिले 52 प्रतिशत
राहुल सिन्हा अपने शुरुआती दिनों में एक औसत से भी कम छात्र माने जाते थे। जब उनके पिता का तबादला हुआ, तब वे एक नए स्कूल की प्रवेश परीक्षा भी पास नहीं कर पाए थे, जिससे उनका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट गया था। वर्ष 1999 में उन्होंने 10वीं की परीक्षा केवल 52% अंकों के साथ पास की थी।
आईआईटी एंट्रेस में तीन बार फेल
वे आईआईटी की तैयारी के लिए कोटा भी गए थे, लेकिन वहां सफल नहीं हो सके। इसके बाद उन्होंने एक प्राइवेट कॉलेज से बीटेक (मेकैनिकल इंजीनियरिंग) की पढ़ाई की। बाद में उन्होंने आईआईएम (IIM) में प्रवेश के लिए एमबीए की तैयारी भी की, लेकिन वहां भी उनका चयन नहीं हुआ। इन नाकामियों के चलते उन्हें और उनके माता-पिता को अकसर रिश्तेदारों और समाज के तीखे और चुभते ताने झेलने पड़ते थे।
बेहद नौकरी की
उन्होंने एक मोल्डिंग कंपनी में मैकेनिकल इंजीनियर के रूप में अपनी पहली नौकरी शुरू की, जहां उन्हें फर्नेस (भट्टी) के पास 70-75 डिग्री सेल्सियस तापमान में काम करना पड़ता था। इसके बाद वे बेंगलुरु में एक साधारण प्राइवेट नौकरी करने लगे। समाज में उन पर मंद बुद्धि और असफल होने का ठप्पा लग चुका था।
34 वर्ष की उम्र में बीपीएससी निकालने का फैसला, लोगों ने उन्हें बेवकूफ कहा
बेंगलुरु में प्राइवेट जॉब करते हुए राहुल के अंदर कुछ बड़ा और असाधारण करने की तड़प हमेशा बनी रही। उस समय उनकी उम्र 34 वर्ष हो चुकी थी। चूंकि वे सामान्य श्रेणी से संबंध रखते थे, उनके पास अन्य अधिकांश सरकारी परीक्षाओं के लिए उम्र सीमा समाप्त हो चुकी थी, लेकिन उन्हें पता चला कि बीपीएससी (BPSC) में एसडीएम पद के लिए अधिकतम उम्र सीमा 37 वर्ष है। उस वक्त उन्हें परीक्षा का सिलेबस भी नहीं पता था। साथ ही, बेंगलुरु जैसे महंगे शहर में रहने का खर्च, पारिवारिक जिम्मेदारियां और उनकी पत्नी के गर्भवती होने के कारण उन पर एक बड़ी जिम्मेदारी थी।
रीस्टार्ट किया
जब उन्होंने बीपीएससी की तैयारी करने का फैसला किया, तो 99 फीसदी लोगों ने उन्हें बेवकूफ कहा और इस उम्र में तैयारी शुरू करने के उनके निर्णय की कड़ी आलोचना की। लेकिन उन्होंने “अभी नहीं तो कभी नहीं” का संकल्प लेकर शुरुआत की। बेंगलुरु में नौकरी करते हुए बेहद मुश्किल हालातों में सेल्फ स्टडी की। तैयारी के दौरान छुट्टियां अधिक लेने के कारण उनकी सैलरी भी रोक दी गई थी। आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई थी कि पैसे बचाने के लिए उन्हें एक सस्ते किराये के घर में शिफ्ट होना पड़ा।
नींद और भोजन में कटौती
उन्होंने अपनी नींद के घंटों को कम कर दिया ताकि पढ़ने के लिए 2-3 घंटे अतिरिक्त मिल सकें। उन्होंने महसूस किया कि जिस दिन वे कम खाते हैं, उस दिन नींद कम आती है, इसलिए उन्होंने अपना भोजन भी कम कर दिया ताकि वे अधिक समय तक पढ़ाई कर सकें।
जब BPSC रिजल्ट आया तो अकाउंट में थे 15000 रुपये
जब इंटरव्यू के बाद अंतिम परिणाम आने वाला था, तब उनके बैंक खाते में मात्र 15,000 रुपये बचे थे। 2 फरवरी 2019 को परिणाम घोषित हुआ और राहुल सिन्हा को एसडीएम (SDM) का पद हासिल हुआ।
ताने वाले मिलने आने लगे
सफलता के बाद लगभग डेढ़ महीने तक उनके लगातार मीडिया इंटरव्यू चलते रहे और जो लोग कभी उन्हें कमतर आंकते थे, वे खुद उनसे मिलने आने लगे।


