केरल के एक आरटीआई कार्यकर्ता ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए पर 2024 के नीट-यूजी विवाद से जुड़े अहम दस्तावेज छिपाने का आरोप लगाया है। यह विवाद परीक्षार्थियों को ग्रेस मार्क्स दिए जाने और बाद में उन्हें वापस लेने के फैसले से जुड़ा था।
साल 2026 में नीट पेपर लीक को लेकर खूब हंगामा हुआ। यहां तक इसके विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन हुए, जिसके चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्रलाय में बड़ा बदलाव देखने को मिला। इस विवाद के चलते धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देना और प्रह्लाद जोशी को देश का नया शिक्षा मंत्री बनाया गया। हालांकि इस विवाद को लेकर अभी भी हंगामा जारी है। इसी बीच केरल के एक आरटीआई कार्यकर्ता ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए पर 2024 के नीट-यूजी विवाद से जुड़े अहम दस्तावेज छिपाने का आरोप लगाया है। यह विवाद परीक्षार्थियों को ग्रेस मार्क्स दिए जाने और बाद में उन्हें वापस लेने के फैसले से जुड़ा था।
आरटीआई कार्यकर्ता प्रणव जीवन का दावा
आरटीआई कार्यकर्ता और आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र प्रणव जीवन का आरोप है कि NTA ने उनकी आरटीआई (RTI) आवेदन का जवाब देने में महीनों की देरी की। इसमें प्रणव ने एजेंसी से 8 अहम सवाल पूछे थे, जिसका जवाब एजेंसी की ओर से अभी तक नहीं दे पाई है। इतना ही नहीं, जुलाई 2025 में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के स्पष्ट निर्देश के बावजूद एजेंसी ने मांगी गई अधिकांश जानकारी देने से भी इनकार कर दिया।
प्रणव ने 13 जून 2024 को आरटीआई आवेदन दाखिल किया था। इसमें उन्होंने 2024 के नीट-यूजी विवाद के दौरान NTA द्वारा गठित दो समितियों से जुड़ी जानकारी मांगी थी। इनमें पहली ‘ग्रिवेंस रिड्रेसल कमेटी’थी, जिसने उन 1,563 अभ्यर्थियों को ग्रेस मार्क्स देने की सिफारिश की थी, जिन्हें छह परीक्षा केंद्रों पर गलत प्रश्नपत्र सेट मिलने के कारण परीक्षा का समय गंवाने का दावा किया गया था।
हालांकि, इस फैसले के महज एक सप्ताह बाद ही दूसरी ‘हाई पावर्ड कमेटी’ ने कथित तौर पर ग्रेस मार्क्स वापस लेने और प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए दोबारा परीक्षा आयोजित कराने की सिफारिश कर दी। दोनों समितियों के विपरीत फैसलों ने उस समय NEET-UG 2024 को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था।
700 दिनों से ज्यादा इंतजार
जून 2024 में जब आरटीआई कार्यकर्ता प्रणव जीवन ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) से दो अहम समितियों से जुड़ी जानकारी मांगते हुए आरटीआई दायर की, तब उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जवाब पाने के लिए उन्हें 700 दिनों से ज्यादा इंतजार करना पड़ेगा। पिछले साल प्रणव की शिकायत पर सुनवाई करते हुए मुख्य सूचना आयोग (CIC) ने NTA को निर्देश दिया था कि आरटीआई में मांगी गई जानकारी 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जाए। हालांकि, आदेश के बावजूद निर्धारित समय में जानकारी नहीं दी गई। लेकिन उस आदेश को भी एक साल से अधिक समय बीत चुका है और प्रणव अब भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं। प्रणव कहते हैं, “मुझे नहीं पता कि यह जानबूझकर किया जा रहा है, अयोग्यता है या फिर भ्रष्टाचार। लेकिन सवाल पूछना और उनका जवाब देना किसी न किसी की जिम्मेदारी है, वरना लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाएगा?”
यदि प्रणव के सवाल इसी तरह अनुत्तरित रह जाते हैं, तो यह सार्वजनिक जवाबदेही (Public Accountability) के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकता है, जहां सरकारी संस्थाएं नागरिकों के सवालों का जवाब देने से बच सकती हैं।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब कई अभ्यर्थियों के असामान्य रूप से अधिक अंक सामने आए। इनमें कुछ छात्रों ने 720 में से पूरे 720 अंक हासिल किए, जबकि कुछ के 719 और 718 अंक दर्ज किए गए। नीट की मार्किंग स्कीम के अनुसार, प्रत्येक सही उत्तर पर 4 अंक मिलते हैं, गलत उत्तर पर 1 अंक की नेगेटिव मार्किंग होती है और बिना उत्तर वाले प्रश्न पर 0 अंक दिए जाते हैं। ऐसे में 719 और 718 जैसे अंक गणितीय रूप से संभव नहीं हैं, जिससे परीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
6 जून 2024 को NTA ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि शैक्षणिक और परीक्षा विशेषज्ञों से बनी ग्रिवेंस रिड्रेसल कमेटी ने सीसीटीवी फुटेज और अन्य रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद 1563 अभ्यर्थियों को ग्रेस मार्क्स देने की सिफारिश की थी। हालांकि, 13 जून 2024 को एजेंसी ने घोषणा की कि हाई पावर्ड कमेटी ने इन कम्पेनसेटरी (ग्रेस) मार्क्स को वापस लेने और प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए दोबारा परीक्षा कराने की सलाह दी है।
क्या मांगी थी जानकारी
प्रणव जीवन ने दावा किया है कि वो अपनी आरटीआई में इन दोनों फैसलों से जुड़े बैठकों की कार्यवाही, आधिकारिक पत्राचार, समिति के सदस्यों के नाम और रिपोर्ट जैसी अहम जानकारी मांगी थी। उनका आरोप है कि NTA ने आरटीआई का जवाब देने में 168 दिन लगा दिए। इतना लंबा इंतजार कराने के बाद भी एजेंसी ने ‘निजता’, ‘सुरक्षा संबंधी प्रतिबंध’ और ‘थर्ड पार्टी सूचना’ का हवाला देते हुए अधिकांश जानकारी देने से इनकार कर दिया। प्रणव जीवन ने कहा, “इस आरटीआई का उद्देश्य यह समझना था कि आखिर इतनी कम अवधि में दो समितियां एक ही मामले में बिल्कुल विपरीत सिफारिशों पर कैसे पहुंच गईं। देश के लाखों छात्र NTA द्वारा आयोजित परीक्षाओं पर निर्भर हैं। ऐसे फैसले परीक्षा प्रणाली में लोगों के भरोसे को सीधे प्रभावित करते हैं।”
NTA ने अपने जवाब में RTI Act की धारा 8 का हवाला दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि मांगी गई जानकारी पर धारा 8 का कौन-सा प्रावधान लागू होता है। एजेंसी ने यह भी कहा कि संबंधित दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में जमा हैं, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। प्रणव जीवन का कहना है कि एजेंसी ने यह भी तर्क दिया कि संबंधित दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में जमा किए गए हैं, इसलिए उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
मामला आखिरकार केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) तक पहुंचा। 31 जुलाई 2025 को जारी अपने आदेश में आयोग ने कहा कि NTA के जवाब RTI अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं और वे आंशिक रूप से गलत और असंगत हैं।
CIC ने NTA को निर्देश दिया कि वह आरटीआई आवेदन में पूछे गए कई सवालों पर दोबारा विचार करे और जहां आवश्यक हो, RTI अधिनियम की धारा 10 के तहत व्यक्तिगत जानकारी हटाकर शेष सूचना उपलब्ध कराए। आयोग ने आरटीआई आवेदन का जवाब देने में हुई देरी पर भी नाराजगी जताई और संबंधित अधिकारियों से इस संबंध में लिखित स्पष्टीकरण मांगा। हालांकि, प्रणव जीवन का आरोप है कि आयोग के निर्देश के बावजूद आज तक उन्हें मांगी गई पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
क्या थे वो 8 सवाल
ग्रेस मार्क्स देने का फैसला किन दस्तावेजों के आधार पर लिया गया?
बैठक की कार्यवाही, सर्कुलर, सरकारी आदेश, ई-मेल और अन्य आधिकारिक पत्राचार उपलब्ध कराए जाएं।
ग्रिवेंस रिड्रेसल कमेटी का पूरा विवरण क्या है?
यह समिति कब और कैसे गठित की गई?
ग्रिवेंस रिड्रेसल कमेटी के सदस्य कौन-कौन थे?
सभी सदस्यों के नाम और पदनाम बताए जाएं।
ग्रिवेंस रिड्रेसल कमेटी की सभी बैठकों की कार्यवाही उपलब्ध कराई जाए।
हाई पावर्ड कमेटी का गठन कैसे हुआ और उसका विवरण क्या है?
हाई पावर्ड कमेटी के सदस्य कौन-कौन थे?
हाई पावर्ड कमेटी की बैठकों की कार्यवाही, रिपोर्ट और वह आधार क्या था, जिसके चलते ग्रेस मार्क्स वापस लेने और री-टेस्ट कराने की सिफारिश की गई?
डेटा स्टडी और विश्लेषण किसने किया और CIC के आदेश के बावजूद जानकारी क्यों नहीं दी गई?


