Pearl Millet farming: खरीफ की फसलों का सीजन आ गया है और ऐसे में देश के अलग-अलग क्षेत्र में किसान खरीफ की खेती शुरू कर रहे हैं. वहीं राजस्थान जैसे सुखे इलाकों में भी किसान इस समय बाजरे की खेती करते हैं. क्योंकि बाजरे में कम पानी की जरूरत होती है, उसमें सूखा सहन करने की क्षमता के कारण इसकी खेती लगातार बढ़ रही है. वहीं अच्छी पैदावार के लिए सही समय पर बुवाई, अच्छी बीज मात्रा और वैज्ञानिक पद्धति अपनाना बहुत जरूरी होता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि बाजरे की खेती के लिए बीच की मात्रा कितनी होनी चाहिए और एक हेक्टेयर का हिसाब-किताब क्या है.
कब की जाती है बाजरे की बुवाई?
बाजरे की बुवाई का समय मानसून पर निर्भर करता है. सामान्य तौर पर इसकी बुवाई जून से जुलाई के बीच की जाती है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 15 जून से 15 जुलाई तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. अच्छी बारिश होने पर समय पर बुवाई करनी चाहिए. वहीं ज्यादा बारिश या लगातार जल प्रवाह की स्थिति में बुवाई करने के बजाय पौध तैयार कर रोपाई भी की जा सकती है. इसके अलावा असिंचित क्षेत्र में जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक बुवाई करने की सलाह दी जाती है, जबकि सिंचित क्षेत्र में जून से अगस्त तक बुवाई की जा सकती है.
एक हेक्टर के लिए कितनी बीज मात्रा जरूरी?
बाजरे की खेती में बीज की मात्रा, किस्म और बुवाई की पद्धति निर्भर करती है. हाइब्रिड या शंकर किस्म के लिए प्रति हेक्टेयर 4 से 5 किलो बीज पर्याप्त माना जाता है. वहीं खुले परागण वाली किस्म के लिए 8 से 10 किलो बीज की जरूरत पड़ सकती है. अगर छिड़काव विधि से बुवाई की जा रही है, तो बीज की मात्रा 10 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक रखी जा सकती है. देर से बुवाई की स्थिति में बीज मात्रा में लगभग 10 प्रतिशत तक के बढ़ोतरी की सलाह दी जाती है. वहीं बुवाई से पहले बीज उपचार भी जरूरी माना जाता है. इसके लिए फफूंद नाशक दवाओं से बीज उपचारित किया जाता है, ताकि जनित रोगों से बचा जा सके.
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बाजार की खेती के लिए उन्नत किस्म
देश के अलग-अलग क्षेत्र में कई उन्नत किस्में विकसित की गई है. इनमें पूसा 23, पूसा 415, पूसा 605, पूसा 322, एचएचबी 50, एचएचबी 67 इंप्रूव्ड, एचएचबी 117, आरएचबी 30, जीएचबी 318, नंदी 8 और एलएलबीएच 104 जैसी किस्में प्रमुख है. इसके अलावा पूसा कंपोजिट 701, पूसा कंपोजिट 1201, पूसा कंपोजिट 266, पूसा कंपोजिट 234 और पूसा कंपोजिट 383 जैसी किस्मों की भी खेती की जाती है. राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में एचएचबी 67 इंप्रूव्ड और पूसा 605 को बेहतर माना जाता है.
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