तेनिथ आदिथ्या तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के वाट्रप गांव के रहने वाले हैं। जब वो महज 11 साल के थे, जब उन्होंने देखा कि किसान सूखे केले के पत्तों को जला रहे थे या फिर कुडे़दान में फेंक देते थे। यह देखकर तेनिथ के मन में सवाल उठा कि किसान इन पत्तों को क्यों जला रहे हैं।
कहते हैं कि एक आविष्कार दुनिया बदलने की ताकत रखता है। एक ऐसा ही आविष्कार किया है तमिलनाडु के बेहद कम उम्र के एक बच्चे ने। इनका नाम तेनिथ आदिथ्या है, जिन्होंने एक ऐसी तकनीकी विकसित की है जिसके जरिए केले के पत्ते की उम्र 3 दिन से 3 साल तक बढ़ाई जा सकती है। यानी इस तकीनीक से केले के पत्तों को अब लंबे समय तक इस्तेमाल कर सकते हैं। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में किसी केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता और पत्तियों को संरक्षित करने की लागत भी महज 70 से 75 पैसे बताई गई है। चलिए जानते हैं कि तेनिथ आदिथ्या कौन हैं और कैसे आया ये आइडिया?
11 साल की उम्र में आया आइडिया
तेनिथ आदिथ्या तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के वाट्रप गांव के रहने वाले हैं। जब वो महज 11 साल के थे, जब उन्होंने देखा कि किसान सूखे केले के पत्तों को जला रहे थे या फिर कुडे़दान में फेंक देते थे। यह देखकर तेनिथ के मन में सवाल उठा कि किसान इन पत्तों को क्यों जला रहे हैं। क्योंकि त्योहारों और शादी-विवाह जैसे समारोहों में इन्हीं पत्तों का इस्तेमाल अक्सर खाना परोसने के लिए किया जाता है। उनसे रहा नहीं गया और आखिरकार उन्होंने किसानों से पूछा लिया कि आप इसे क्यों जला रहे हैं? तब किसानों ने बताया कि सूख चुके पत्ते उनके किसी काम के नहीं हैं। यही बात उनके मन में बैठ गई और उन्होंने इन बेकार समझे जाने वाले पत्तों को दोबारा उपयोगी बनाने का तरीका खोजने का फैसला किया।
चार साल तक किया रिसर्च
इस आइडिया को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में करीब चार साल तक रिसर्च किया। उनका उद्देश्य ऐसी टिकाऊ जैव-सामग्री तैयार करना था, जो फ्यूचर में कागज और प्लास्टिक जैसी जीचों का बेहतर विकल्प बन सके। लगातार प्रयोग और शोध के बाद उन्होंने आखिरकार ‘बनाना लीफ टेक्नोलॉजी’ विकसित कर दिया। यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित तकनीक है, जिसमें पत्तियों को लंबे समय तक बचाने के लिए किसी केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
3 साल तक बढ़ जाती है उम्र
अमूमन केले के पत्तों की उपयोग अवधि करीब तीन दिन ही होती है। इस तकनीक के जरिए इन्हें तीन साल तक संरक्षित किया जा सकता है और उनका नेचुरल रंग भी बरकरार रहता है।
प्लेट, कप और बॉक्स जैसी चीजें बना सकते हैं
इस तकनीक के फायदे भी कई हैं। यह ऑर्गेनिक, केमिकल-फ्री है। केले के पत्तों की इस तकनीक से प्लेट, कप, लिफाफे, स्ट्रॉ और बॉक्स समेत कई तरह के उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इससे हर साल करीब 7 अरब पेड़ों की कटाई को रोकने में मदद कर सकती है। इस तकनीक की एक खास बात इसकी कम लागत भी है। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक,एक केले के पत्ते को प्रोसेस करने की लागत करीब 0.01 अमेरिकी डॉलर यानी 70 से 75 पैसे है।
मिल चुके हैं कई इंटरनेशनल अवॉर्ड
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तकनीक को 7 से अधिक अंतरराष्ट्रीय और दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें प्रतिष्ठित इंटरनेशनल एनवायरनमेंटल अवॉर्ड, इंटरनेशनल ग्रीन टेक्नोलॉजी अवॉर्ड और टेक्नोलॉजी फॉर द फ्यूचर अवॉर्ड समेत कई सम्मान शामिल हैं।


