Iran War Fertilizer Prices: ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने न सिर्फ ग्लोबल पॉलिटिक्स में हलचल मचाई है. बल्कि इसका सीधा असर अब भारतीय किसानों की खेती और उनकी जेब पर भी पड़ता दिख रहा है. मिडिल ईस्ट में मचे इस घमासान की वजह से खाद की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है जिसके चलते इंटरनेशनल मार्केट में फर्टिलाइजर की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है.
दरअसल हॉर्मुज जलडमरूमध्य यानी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम रास्तों पर व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से माल ढुलाई का खर्च बढ़ गया है जिसका खामियाजा अब बाजारों में नजर आने लगा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है इसलिए वहां की छोटी सी चिंगारी यहां खाद की कीमतों में आग लगाने का काम कर रही है.
युद्ध के चलते सप्लाई चेन रुकावट
इंटरनेशनल मार्केट में खाद की बढ़ती कीमतों के पीछे सबसे बड़ा हाथ ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स में आने वाली रुकावटों का है. क्योंकि युद्ध के माहौल ने समुद्री रास्तों को असुरक्षित बना दिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक ऐसा रूट है जहां से दुनिया का बड़ा व्यापार होता है और ईरान के प्रभाव वाले इस इलाके में तनाव बढ़ने से शिपिंग कंपनियां अब लंबे रास्तों का चुनाव कर रही हैं.
जब रास्ते लंबे होते हैं तो फ्यूल का खर्च और इंश्योरेंस का प्रीमियम भी बढ़ जाता है जिससे खाद की लैंडिंग कॉस्ट में भारी इजाफा हो गया है. कंपनियों के लिए समय पर स्टॉक मंगवाना एक बड़ी चुनौती बन गया है जिससे पोर्ट्स पर माल की कमी और बाजार में अनिश्चितता का माहौल साफ दिख रहा है.
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सरकारी सब्सिडी पर दबाव
ग्लोबल मार्केट में खाद के दाम बढ़ने का मतलब है कि सरकार पर सब्सिडी का बोझ अब पहले से कहीं ज्यादा भारी होने वाला है. हालिया रिपोर्ट्स की मानें तो वैश्विक कीमतों में आए इस उछाल की वजह से भारत का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ सकता है जो सरकारी खजाने के लिए एक बड़ा झटका है.
सरकार की कोशिश यही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दाम कितने भी बढ़ें लेकिन किसानों को खाद पुराने रेट पर ही मिलती रहे ताकि उन पर खेती की लागत का बोझ न पड़े. हालांकि सब्सिडी में होने वाली यह बढ़ोतरी बजट के गणित को बिगाड़ सकती है क्योंकि कच्चे माल और तैयार खाद दोनों के लिए अब डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है.
किसान बाजार का हाल
फिलहाल किसान बाजार में खाद की उपलब्धता को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. क्योंकि सप्लाई चेन में देरी से आने वाले सीजन के लिए चिंताएं बढ़ गई हैं. डीलर्स और रिटेलर्स इस बात को लेकर सतर्क हैं कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो आने वाले समय में यूरिया और डीएपी जैसे जरूरी खाद की किल्लत हो सकती है. हालांकि सरकार ने पर्याप्त बफर स्टॉक होने का दावा किया है.
लेकिन फिर भी बाजार में जमाखोरी जैसी आशंकाएं बनी हुई हैं जो कीमतों को कंट्रोल से बाहर कर सकती हैं. किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे समय रहते अपना इंतजाम कर लें जिससे युद्ध के चलते होने वाली किसी भी ग्लोबल सप्लाई रुकावट का उनकी फसल पर बुरा असर न पड़े.
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