Land Rules: भारत में जमीन को लेकर कई कानून तय किए गए हैं. जो खेती की जमीन और व्यावसायिक जमीन को लेकर बिल्कुल अलग-अलग हैं. इसमें SC-ST की जमीन को लेकर भी कुछ कानून तय किए गए हैं. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) की जमीन को जनरल कैटेगरी में ट्रांसफर या शिफ्ट कराया जा सकता है. तो आपको बता जें इसका सीधा सा जवाब है, हां ऐसा मुमकिन है.
भारतीय कानून में कमजोर वर्गों के अधिकारों और उनकी जमीनों को भू-माफियाओं से सुरक्षित रखने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं जिससे कोई उनका गलत फायदा न उठा सके. हालांकि अगर आप सही कानूनी प्रक्रिया अपनाएं और सरकारी अधिकारियों से सही इजाजत लें तो जमीन की कैटेगरी या मालिकाना हक को नियमानुसार बदला जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसका पूरा प्रोसेस क्या है और इसके लिए किन कागजात की जरूरत पड़ती है और इसमें कुल कितना खर्चा आता है.
SC-ST जमीन ट्रांसफर के लिए कानून क्या कहता है?
अगर कानून के नजरिए से देखें तो SC-ST समाज की जमीन को सीधे तौर पर किसी भी जनरल कैटेगरी के इंसान को बेचना पूरी तरह मना है. राज्य सरकारों के लैंड रेवेन्यू एक्ट और भू-राजस्व कानूनों के तहत इस तरह की जमीनों के ट्रांसफर पर सख्त रोक लगी होती है. लेकिन कानून में इस नियम का एक विशेष अपवाद भी दिया गया है. अगर जमीन का असली मालिक अपनी मर्जी से जमीन बेचना चाहता है और उसके सामने कोई बहुत बड़ी मजबूरी है.
जैसे घर में किसी गंभीर बीमारी का इलाज, बच्चों की उच्च शिक्षा, शादी-ब्याह का खर्च या कोई अन्य बड़ा आर्थिक संकट तो वह जिला कलेक्टर के पास परमिशन के लिए आवेदन कर सकता है. बिना डीएम की लिखित मंजूरी के अगर कोई ऐसी जमीन खरीद लेता है. तो वह पूरी डील गैर-कानूनी मानी जाएगी. ऐसे में जमीन का सौदा रद्द हो जाएगा और वह प्रॉपर्टी वापस पहले के मालिक या सरकार के खाते में दर्ज हो जाएगी.

कैसे मिलती है सरकारी परमिशन?
कलेक्टर से NOC यानी परमिशन लेने का प्रोसेस थोड़ा समय लेने वाला और सब्र का काम है. सबसे पहले जमीन के SC-ST मालिक को अपने जिले के डीएम या कलेक्टर ऑफिस में एक फॉर्मल एप्लीकेशन जमा करनी होती है. इस अर्जी में जमीन बेचने की असली और जायज वजह का पूरा ब्योरा देना पड़ता है. अर्जी जमा होने के बाद कलेक्टर ऑफिस से यह फाइल संबंधित क्षेत्र के तहसीलदार और पटवारी के पास भेजी जाती है.
लोकल रेवेन्यू टीम मौके पर जाकर जांच-पड़ताल करती है कि जमीन बेचने वाले पर किसी का दबाव तो नहीं है, जमीन विवादित तो नहीं है और क्या यह जमीन बिक जाने के बाद भी उसके पास रहने या खेती के लिए पर्याप्त जमीन बचेगी. जब पटवारी और तहसीलदार अपनी पॉजिटिव रिपोर्ट तैयार करके कलेक्टर को भेजते हैं. तब जाकर डीएम ऑफिस से ऑफिशियल NOC यानी जमीन बेचने का अप्रूवल जारी होता है.

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कितना आता है पूरा खर्चा?
इस पूरे प्रोसेस में कितना पैसा खर्च होगा, इसका कोई एक फिक्स रेट तय नहीं होता है. यह खर्च अलग-अलग राज्यों के नियमों और जमीन के लोकेशन और सरकारी रेट पर निर्भर करता है.
- स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज: जनरल प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री की तरह ही इसमें स्टाम्प ड्यूटी देनी पड़ती है. हालांकि, स्पेशल परमिशन वाले मामलों में कुछ अतिरिक्त प्रोसेसिंग फीस जुड़ सकती है. सामान्यतः स्टाम्प ड्यूटी राज्य के हिसाब से सरकारी सर्किल रेट का 5% से 8% तक होती है.
- लीगल फीस और एडवोकेट खर्च: पटवारी रिपोर्ट तैयार कराने, कलेक्टर ऑफिस में केस फाइल करने और पूरी दौड़-धूप के लिए किसी अच्छे रेवेन्यू वकील की फीस लगती है. जो 20000 रुपये से लेकर 50000 रुपये या उससे ज्यादा भी हो सकती है.
- सरकारी आवेदन फीस: डीएम ऑफिस में परमिशन एप्लीकेशन जमा करने, एफिडेविट बनवाने और NOC हासिल करने की मामूली सरकारी फीस चुकानी पड़ती है.
कुल मिलाकर देखा जाए तो इस पूरी डाॅक्यूमेंटेशन प्रोसेस में जमीन के सर्किल रेट का कुछ प्रतिशत हिस्सा और वकील की फीस मिलाकर एक अच्छा-खासा बजट पहले से तय करके चलना पड़ता है.
किन बातों का ध्यान रखना है जरूरी?
SC-ST की जमीन खरीदते या ट्रांसफर कराते वक्त जरा सी भी जल्दबाजी या लापरवाही आपको बड़े कानूनी झंझट में डाल सकती है. सबसे पहली बात यह ध्यान रखें कि जमीन बेचने की परमिशन कागजों पर बिल्कुल असली हो और वह डीएम ऑफिस से प्रॉपर्ली अटेस्टेड हो. अक्सर लोग सिर्फ 100 या 500 रुपये के स्टाम्प पेपर पर एग्रीमेंट कराकर मान लेते हैं कि डील पक्की हो गई लेकिन कानून की नजर में ऐसा एग्रीमेंट पूरी तरह इनवैलिड होता है.
जब तक डीएम की लिखित परमिशन न मिले और रजिस्ट्री के बाद तहसील में म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज न हो जाए तब तक सौदे को अधूरा ही समझें. इसलिए कभी भी किसी अच्छे रेवेन्यू लॉयर से पेपर्स की जांच कराए बिना और कलेक्टर की NOC देखे बिना एडवांस पैसा देने की गलती बिल्कुल न करें.
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